मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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मीडिया के प्रति अविश्वास बढ़ाता 'फ़ेक न्यूज़' का बढ़ता चलन

तनवीर जाफ़री/ मीडिया देश व समाज के सभी वर्गों व अंगों को एक दूसरे से बाख़बर करने का दायित्व  निभाता आ रहा है।  जन मानस मीडिया द्वारा प्रकाशित /प्रसारित ख़बरों पर न केवल विश्वास करता है बल्कि इसके माध्यम से सामने आने वाले विषयों व मुद्दों को बहस,चर्चा व जानकारी का सशक्त ज़रीया भी समझता है।परन्तु दुर्भाग्यवश हमारे देश में लालची,सत्ताभोगी तथा व्यवसायिक सोच रखने वाले मीडिया से ही संबद्…

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सिटिज़न जर्नलिज़्म: प्रोत्साहन के साथ-साथ प्रशिक्षण भी जरुरी

चुनौतियों के बावजूद नागरिक पत्रकारिता में असीम संभावना है

डॉ. पवन सिंह मलिक/ सिटिज़न जर्नलिज़्म शब्द जिसे हम नागरिक पत्रकारिता भी कहते है आज आम आदमी की आवाज़ बन गया है। यह समाज के प्रति अपने कर्तव्य को समझते हुए, संबंधित विषय को कंटेंट के माध्यम से तकनीक का सहारा लेते हुए अप…

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दोष रेटिंग पर डालकर फिर से प्रोपेगैंडा चालू!

रवीश कुमार। रेटिंग को लेकर जो बहस चल रही है उसमें उछल-कूद से भाग न लें। ग़ौर से सुनें और देखें कि कौन क्या कह रहा है। जिन पर फेक न्यूज़ और नफ़रत फैलाने का आरोप है वही बयान जारी कर रहे हैं कि इसकी इजाज़त नहीं देंगे। रही बात रेटिंग एजेंसी की रेटिंग को 12 हफ्ते के लिए स्थगित करने की तो इससे क्या हासिल होगा। जब टैम बदनाम हुआ तो बार्क आया। बार्क बदनाम हुआ तो स्थगित कर, कुछ ठीक कर वि…

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लोकमंगल की पत्रकारिता और वर्तमान चुनौतियां

मनोज कुमार/ अपने जन्म से लेकर अब तक की पत्रकारिता लोकमंगल की पत्रकारिता रही है। लोकमंगल की पत्रकारिता की चर्चा जब करते हैं तो यह बात शीशे की तरह साफ होती है कि हम समाज के हितों के लिए लिखने और बोलने की बात करते हैं। लोकमंगल के वृहत्तर दायित्व के कारण ही पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तम्भ कहा गया है। वर्तमान समय में सबसे ज्यादा आलोचना के केन्द्र में पत्रकारिता है और समाज सवाल कर रह…

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टीआरपी: मीडिया की साख पर आंच

डॉ. पवन सिंह मलिक/ चौबीस घंटे सबकी खबरें देने वाले टीवी न्यूज़ चैनल अगर खुद ही ख़बरों में आ जाए, तो इससे बड़ी हैरानी व अचंभित करने वाली ख़बर क्या होगी। परंतु पिछले कुछ घंटो में ऐसा ही नज़ारा टीवी पर हम सब देख रहे है। पर ये तो सीधा-सीधा उन करोड़ों दर्शकों की आस्था के साथ धोखा है, जो टीवी मीडिया पर विश्वास करते हैं। जिनके लिए टीवी पर दिखाई जाने वाली न्यूज़ व व्यूज़ दोनों ही सत्य है…

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पत्रकार कर रहे खबर का एजेंडा तय!

क्या बिना किसी तथ्य के बिहार में खबरें चल रही हैं? क्या कुछेक पत्रकार मिलकर कर रहे हैं खबर का एजेंडा तय ? पटना निवासी वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह ने अपने फेसबुक पर आज ही यह पोस्ट लगाई है। वे कहते हैं - बहुत बुरा हाल है फिर भी कोशिश जारी है। …

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गला फाड़ पत्रकारिता

टी आर पी की ख़ातिर 'जमूरा' कुछ भी करेगा !

निर्मल रानी/ जिस तरह भारतीय राजनीति इस समय देश के राजनैतिक इतिहास के सबसे संक्रमण कालीन दौर से गुज़र रही है ठीक उसी तरह भारतीय मीडिया भी घोर संक्रमण काल से रूबरू है। टेलीविज़न के शुरूआती दौर के जाने माने अनेक टी वी एंकर्स जैसे जे बी रमन, शम्मी नारंग, विनोद दुआ, प्रणव राय व प्रभु चा…

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ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी पर ब्रेक

शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन्हें भाता है!

मनोज कुमार/ ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी के चलन पर ब्रेक लग गया है. आप हिन्दी के हिमायती हों और हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिन्दी को अलंकृत करते रहें, उसमें विशेषण लगाकर हिन्दी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न कर…

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न्याय के नाम पर क्या कर रहे हैं चैनल

मीडिया आत्महत्या भी कर रहा है, कई चीज़ों की हत्या भी

विनीत कुमार। इस तस्वीर से हम सबको डरना चाहिए. सारी बातों को पीछे रखकर सोचना चाहिए कि साल 2005 में गड्ढे में गिर गए छोटे प्रिंस को बचाने के लिए जी न्यूज़ जैसे चैनल ने पचास घंटे से ज़्यादा कवरेज दी और बाकी चैनल भी लगातार दिखाते रहे, चैनल की इ…

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तो क्यों न मैन पावर ही घटा लें?

अखबारों में छंटनी क्या कम कमाई के कारण है? 

पुष्य मित्र। अखबारों में कर्मियों की छटनी जरूर हो रही है, मगर यह कहना गलत है कि कोरोना काल में अखबारों की आय घटी है। अखबारों की प्रसार संख्या जरूर घटी है, मगर अखबारों का एकनॉमिक्स समझने वाले जानते हैं कि प्रसार बढ़ने का अखबारों की आय बढ़ने से कोई सीधा रिश्ता नहीं है…

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और भी मुद्दे --

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