मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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ज़मीर फ़रोश पत्रकारिता पर एक और प्रहार

निर्मल रानी/ स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताने वाला मीडिया विशेषकर टेलीवीज़न मीडिया जहाँ गत कुछ वर्षों से सत्ता के समक्ष 'शाष्टांग दंडवत' की मुद्रा में आकर भारतीय इतिहास के सबसे शर्मनाक दौर से गुज़र रहा है वहीं अभी भी कुछ चरित्रवान तथा पत्रकारिता के कर्तव्यों  व सिद्धांतों का ईमानदारी से निर्वहन करने वाले ऐसे लोग बाक़ी हैं जो सही मायने में पत्रकारिता की लाज रखे हुए हैं। इस समय…

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सोशल-मीडिया कंपनियों पर नहीं, जनता की ज़ुबान पर ताला

प्रमोद रंजन / फरवरी के अंतिम सप्ताह में  भारतीय डिज़िटल दुनिया में यह ख़बर छायी रही कि सरकार सोशल-मीडिया कंपनियों  पर लगाम कसने के लिए एक कड़ा नियमन लेकर आयी है। इसे “…

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भारत मे पत्रकारिता मर चुकी है!

वह सही संदर्भों के साथ खबर पेश नही करती

गिरीश मालवीय। मुझे लगता है कि भारत मे पत्रकारिता मर चुकी है, कल एक खबर का जो हश्र देखा है उसे देखकर बिल्कुल यही महसूस हुआ, कल मुंबई में एक होटल से वर्तमान लोकसभा के एक सांसद की लाश बरामद हुई है और वो भी संदिग्ध परिस्थितियों में ...…. वो भी कोई साधारण सांसद नही बल्कि वह स…

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क्या भारत में प्रेस की आज़ादी बिल्कुल ख़त्म हो जाएगी ?

रवीश कुमार/ मनदीप पुनिया की गिरफ़्तारी से आहत हूँ। हाथरस केस में सिद्दीक़ कप्पन का कुछ पता नहीं चल रहा। कानपुर के अमित सिंह पर मामला दर्ज हुआ है। राजदीप सरदेसाई और सिद्धार्थ वरदराजन पर मामला दर्ज हुआ है। क्या भारत में प्रेस की आज़ादी बिल्कुल ख़त्म हो जाएगी ? आज मैंने ट्विटर पर ट्विट किया है। अगस्त 2015 के बाद आज पहली बार ट्विट किया है। वही पत्र यहाँ डाल रहा हूँ ।…

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'पूछता है भारत': क्या देश को चाहिए ऐसी ही पत्रकारिता?

तनवीर जाफ़री/ 'बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा' , हमारे देश में तमाम चतुर,चालाक,स्वार्थी व निठल्ले क़िस्म के लोगों ने शोहरत पाने का यही शॉर्ट कट रास्ता अपनाया हुआ है। विवादों का शोहरत से हमेशा ही गहरा नाता भी रहा है। जो भी व्यक्ति अथवा विषय विवादित तरीक़े से मीडिया द्वारा प्रचारित-प्रसारित किया जाता है उसे प्रसिद्धि या सफलता की गारण्टी माना जाता है। प्रायः अनेक लोग जानबूझकर ऐसी…

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जब मीडिया सरकार चुन ले तो जनता को अख़बार चलाना पड़ता है

रवीश कुमार।  किसान आंदोलन के बीच एक अख़बार निकलने लगा है। इस अख़बार का नाम है ट्राली टाइम्स। पंजाबी और हिन्दी में है। जिन किसानों को लगा था कि अख़बारों और चैनलों में काम करने वाले पत्रकार उनके गाँव घरों के हैं, उन्हें अहसास हो गया कि यह धोखा था। गाँव घर से आए पत्रकार अब सरकार के हो चुके हैं। किसान आंदोलन के बीच से अख़बार का निकलना भारतीय मीडिया के इतिहास का सबसे शर्मनाक दिन है।…

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मीडिया के प्रति अविश्वास बढ़ाता 'फ़ेक न्यूज़' का बढ़ता चलन

तनवीर जाफ़री/ मीडिया देश व समाज के सभी वर्गों व अंगों को एक दूसरे से बाख़बर करने का दायित्व  निभाता आ रहा है।  जन मानस मीडिया द्वारा प्रकाशित /प्रसारित ख़बरों पर न केवल विश्वास करता है बल्कि इसके माध्यम से सामने आने वाले विषयों व मुद्दों को बहस,चर्चा व जानकारी का सशक्त ज़रीया भी समझता है।परन्तु दुर्भाग्यवश हमारे देश में लालची,सत्ताभोगी तथा व्यवसायिक सोच रखने वाले मीडिया से ही संबद्…

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सिटिज़न जर्नलिज़्म: प्रोत्साहन के साथ-साथ प्रशिक्षण भी जरुरी

चुनौतियों के बावजूद नागरिक पत्रकारिता में असीम संभावना है

डॉ. पवन सिंह मलिक/ सिटिज़न जर्नलिज़्म शब्द जिसे हम नागरिक पत्रकारिता भी कहते है आज आम आदमी की आवाज़ बन गया है। यह समाज के प्रति अपने कर्तव्य को समझते हुए, संबंधित विषय को कंटेंट के माध्यम से तकनीक का सहारा लेते हुए अप…

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दोष रेटिंग पर डालकर फिर से प्रोपेगैंडा चालू!

रवीश कुमार। रेटिंग को लेकर जो बहस चल रही है उसमें उछल-कूद से भाग न लें। ग़ौर से सुनें और देखें कि कौन क्या कह रहा है। जिन पर फेक न्यूज़ और नफ़रत फैलाने का आरोप है वही बयान जारी कर रहे हैं कि इसकी इजाज़त नहीं देंगे। रही बात रेटिंग एजेंसी की रेटिंग को 12 हफ्ते के लिए स्थगित करने की तो इससे क्या हासिल होगा। जब टैम बदनाम हुआ तो बार्क आया। बार्क बदनाम हुआ तो स्थगित कर, कुछ ठीक कर वि…

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लोकमंगल की पत्रकारिता और वर्तमान चुनौतियां

मनोज कुमार/ अपने जन्म से लेकर अब तक की पत्रकारिता लोकमंगल की पत्रकारिता रही है। लोकमंगल की पत्रकारिता की चर्चा जब करते हैं तो यह बात शीशे की तरह साफ होती है कि हम समाज के हितों के लिए लिखने और बोलने की बात करते हैं। लोकमंगल के वृहत्तर दायित्व के कारण ही पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तम्भ कहा गया है। वर्तमान समय में सबसे ज्यादा आलोचना के केन्द्र में पत्रकारिता है और समाज सवाल कर रह…

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और भी मुद्दे --

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