डॉ. लोकेन्द्र सिंह/ मीडिया प्राध्यापक एवं लेखक प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘संजय उवाच’ उनके चुनिंदा और सारगर्भित भाषणों का उत्कृष्ट संग्रह है। अकादमिक जगत से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन्होंने जो व्याख्यान दिए, उनको पाठकों के लिए संपादित कर पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। ज्यादातर व्या…
Blog posts : "पुस्तक समीक्षा"
अपने समय से संवाद का नाम है ‘संजय उवाच’
भारतीय विचार के मजबूत स्तंभ ‘11 महानायक’
डॉ. लोकेन्द्र सिंह / भारत में महापुरुषों की एक लंबी शृंखला है। भारत के सुदीर्घ इतिहास के प्रत्येक कालखंड में हमें ऐसे नायक दिखाई देते हैं, जिन्होंने भारतीय समाज का मार्ग प्रशस्त किया। ऐसे में कुछ नायकों को चुनना और उनके व्यक्तित्व पर लिखना, अत्यंत कठिन कार्य है। अपने लेखन के दौरान प्रो. संजय द्विवेद…
पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का दस्तावेज है – ‘...लोगों का काम है कहना’
सुदर्शन व्यास/ ‘लोगों का काम है कहना...’ पुस्तक का आखिरी पन्ना पलटते समय संयोग से महात्मा गांधी का एक ध्येय वाक्य मन–मस्तिष्क में गूंज उठा – ‘कर्म ही पूजा है’। जब मैं इस किताब को पढ़ रहा था तो बार–बार महात्मा गांधी का ये वाक्य सहसा अंतर्गन में सफर कर रहा था। ये कहूँ तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ब…
शिवाजी के किलों की कहानी बताती है ‘हिन्दवी स्वराज्य दर्शन’
प्रो. (डॉ) संजय द्विवेदी/ लेखक लोकेन्द्र सिंह बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। कवि, कहानीकार, स्तम्भलेखक होने के साथ ही यात्रा लेखन में भी उनका दखल है। घुमक्कड़ी उनका स्वभाव है। वे जहाँ भी जाते हैं, उस स्थान के अपने अनुभवों के साथ ही उसके ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व से सबको परिचित कराने का प्रयत्न भी वे…
लोकहृदय के प्रतिष्ठापक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
बी. एल. आच्छा/ कहते हैं कि आलोचकों की मूर्तियां नहीं बनती। पर दौलतपुर (रायबरेली) के आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी तो अपवाद हैं ही। और साहित्य में लोकहृदय के प्रतिष्ठापक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का व्यक्तित्व तो हिन्दी के हर पाठक में मूर्तिमान है। यह क्या कम है कि ग्राम अगौना जनपद बस्ती (उ.प्र) में सन …
कुछ तो लोग कहेंगे...लोगों का काम है कहना
डॉ. विनीत उत्पल/ संजय द्विवेदी महज एक नाम है। वह नाम नहीं, जिसके आगे प्रोफेसर या डॉक्टर लगा हो। वह नाम नहीं, जिसके बाद महानिदेशक या कुलपति लगा हो। यह नाम है ऐसे शख्स का, जो समाज के एक तबके से लेकर किसी संस्थान या फिर राष्ट्र की तकदीर बदलनी की क्षमता रखता है। वह राख की एक छोटी-सी चिंगारी को भी विराट …
‘मीडिया को जो लोग चला रहे हैं, वे दरअसल मीडिया के लोग नहीं हैं’
संत समीर/ आजकल आमतौर पर जिस तरह के साक्षात्कार हमें पढ़ने को मिलते हैं, यदि उनके भीतर की परतों को पहचानने की कोशिश करें तो कम ही साक्षात्कार मिलेंगे जो सही मायने में सच का साक्षात् करा पाते हों। आत्मश्लाघा इस दौर के साक्षात्कारों की आम बात है। असुविधाजनक प्रश्नों से बचकर निकल लेना या गोलमोल उत्तरों …
पत्रकारिता से साहित्य में चली आई ‘न हन्यते’
इंदिरा दांगी/ आचार्य संजय द्विवेदी की नई किताब 'न हन्यते' को खोलने से पहले मन पर एक छाप थी कि पत्रकारिता के आचार्य की पुस्तक है और दिवंगत प्रख्यातों के नाम लिखे स्मृति-लेख हैं, जैसे समाचार पत्रों में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ करते ही हैं; लेकिन पुस्तक का पहला ही शब्द-चित्र मेरी इस धारणा को तोड़त…
पत्रकारिता की शक्ति को बताने वाली दस्तावेजी पुस्तक है ‘रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध’
लाजपत आहूजा के संपादन में इस पुस्तक को लिखा है, लेखक लोकेन्द्र सिंह, दीपक चौकसे और परेश उपाध्याय ने
डॉ. गजेन्द्र सिंह अवास्या/ भारत में पत्रकारिता का एक गौरवशाली इतिहास है। समाज जागरण से लेकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता की चेतना जगाने में पत्रकारों एवं समाचारपत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका का …
आत्मीयता से ओत-प्रोत स्मृतियां
पुस्तक समीक्षा/ प्रो. कृपाशंकर चौबे/ प्रो. संजय द्विवेदी की उदार लोकतांत्रिक चेतना का प्रमाण उनकी सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘न हन्यते’ है। ‘न हन्यते' पुस्तक में दिवंगत हुए परिचितों, महापुरुषों के प्रति आत्मीयता से ओत-प्रोत संस्मरण और स्मृति लेख हैं। ये स्मृति लेख नई पीढ़ी के लिए दृष्टांत हैं कि अपने समय …
समकालीन भारत को समझने की कुंजी है ‘भारतबोध का नया समय’
आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक
प्रो. कृपाशंकर चौबे/ जनसंचार के गंभीर अध्येता प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘भारतबोध का नया समय’ का पहला ही निबंध इसी शीर्षक से है। भारतबोध की समझ को स्पष्ट करने के लिए लेखक ने गांधी, धर्मपाल, लोहिया, वासुदेव शरण अग्रवाल, निर्मल वर्मा से …
राजनीति का संदर्भ ग्रंथ है “लोकतंत्र का स्पंदन”
पत्रकार अभिमनोज की अभिनव पहल है उनकी यह पुस्तक
प्रदीप द्विवेदी / आधुनिक पत्रकारिता में समाचार विश्लेषक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है. प्रमुख राष्ट्रीय समाचार विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार- अभिमनोज, पत्रकारिता में नए प्रयोगों के लिए प्रसिद्ध हैं. अभिमनोज की अभिनव पहल है उनकी पुस्तक.... लोकतंत्र…
‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ पर स्पष्ट दृष्टिकोण पैदा करती पुस्तक
सुरेश हिंदुस्थानी/ राष्ट्रवाद सदैव से चर्चा एवं आकर्षण का विषय रहा है। आज के परिदृश्य में तो यह और अधिक चर्चित है। सब जानना चाहते हैं कि आखिर राष्ट्रवाद क्या है? राष्ट्रवाद पर इतनी बहस क्यों होती है? क्यों कुछ लोग राष्ट्रवाद का विरोध करते हैं? राष्ट्रवाद और मीडिया के बीच क्या संबंध है? राष्ट्रवाद क…
"पैसा ही पैसा" जीवन की सच्चाई के करीब
संजय कुमार /पुस्तक चर्चा/ पैसा ही पैसा माधुरी सिन्हा की सद्यः प्रकाशित पुस्तक है जिसे पटना के प्रकाशक नोवेल्टी एंड कंपनी में प्रकाशित किया है. जैसा कि पुस्तक का शीर्षक है ‘पैसा ही पैसा’ तो यह एक ऐसे गरीब बच्चे की कहानी है इसका जीवन गरीबी में व्यतीत हुआ. माधुरी सिन्हा ने अब तक कई उपन्यास लिखे हैं थाम…
अच्छी तरह से जानते हैं हत्यारे
अरविंद भारती की किताब “वे लुटेरे हैं
शहंशाह आलम/ यह विदा कहने का वक़्त है।
इसलिए हे राजन, आप चौंके अथवा चीहुँकें अथवा विस्मय में न पड़ें।
इसलिए हे राजन, यह वक़्त कवि अरविंद भारती को विदा कहने का वक़्त नहीं है। न इनकी कविता की विदाई की घोषणा अभी की जानी है। विदाई तो अच्छे मूल्यों …
ढाई हजार वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध ने पर्यावरण सुरक्षा का मर्म समझा
लेखक-पत्रकार डॉ ध्रुव कुमार की पुस्तक "बौद्ध धर्म और पर्यावरण "
संजय कुमार/ वर्तमान दौर में पर्यावरण के समक्ष संकट और ग्लोबल वार्मिंग से पूरी दुनिया चिंतित है । अनेक देशों में बढ़ते औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और जनसंख्या विस्फोट के कारण भूमंडलीय तापमान में वृद्धि हो रही है। रही सही कसर मानव की आधुनिक…
एक पत्रकार के रिपोर्ताजों का कोलाज
जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती है डॉ. दीनानाथ साहनी की पुस्तक ‘तीसरी बस्ती’
संजय कुमार/ पुस्तक समीक्षा/ डॉ. दीनानाथ साहनी लम्बे समय से पत्रकारिता से जुड़े है। पत्रकारिता के साथ साथ साहित्य के विभिन्न विद्याओं पर कलम चलायी है। कविता, कहानी, उपन्यास पर खूब लिखा है। उनकी पुस्तक तीसरी बस्ती उनके पत्र…
दलित साहित्य आंदोलन का दस्तावेज
कैलाश दहिया / पुस्तक समीक्षा / 'समकालीन हिंदी दलित साहित्य : एक विचार-विमर्श' नाम से वरिष्ठ लेखक सूरजपाल चौहान के समय- समय पर पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों- आलेखों का संग्रह है। किताब की भूमिका में लेखक ने लिखा है, 'इनका महत्त्व मुझे तब ज्ञात हुआ जब देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से दलित लेखन पर शोध…
‘आरटीआई से पत्रकारिता' की विधि सिखाती एक पुस्तक
लोकेन्द्र सिंह/ भारत में सूचना का अधिकार, अधिनियम-2005 (आरटीआई) लंबे संघर्ष के बाद जरूर लागू हुआ है, किंतु आज यह अधिकार शासन-प्रशासन व्यवस्था को पारदर्शी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जहाँ सूचनाओं को फाइल पर लालफीता बांध कर दबाने की प्रवृत्ति रही हो, वहाँ अब साधारण नागरिक भी सामान्य प्रक्…
स्त्री चेतना को जगाती कविताएं
एम अफसर खान 'सागर'/ सुहैल मेरे दोस्त उषा राय की पहली कविता संग्रह है। कुल चौव्वालीस (44) कविताओं का यह संग्रह स्त्री जीवन के विभिन्न रूपों को दर्शाती है, जिसमें करुणा, आक्रोश, ममता, दया और यथार्थ शामिल है। इसके साथ इस संग्रह में सामाजिक, पारिवारिक विद्रूपताओं के सरोकार भी परिलक्षित हैं। आजकल कविताएं…
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- स्मृति कल्प का आयोजन 14 जून को
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सुख मंगल सिंहJuly 4, 2026
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कैलाश दहियाJuly 3, 2026
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Kailash DahiyaJuly 3, 2026
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Omprakash KashyapJune 30, 2026
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रवि अहिरवारJanuary 6, 2025
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पंकज चौधरीDecember 17, 2024
सम्पादक
डॉ. लीना
