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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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"पैसा ही पैसा" जीवन की सच्चाई के करीब

संजय कुमार /पुस्तक चर्चा/ पैसा ही पैसा माधुरी सिन्हा की सद्यः प्रकाशित पुस्तक है जिसे पटना के प्रकाशक नोवेल्टी एंड कंपनी में प्रकाशित किया है. जैसा कि पुस्तक का शीर्षक है ‘पैसा ही पैसा’ तो यह एक ऐसे गरीब बच्चे की कहानी है इसका जीवन गरीबी में व्यतीत हुआ. माधुरी सिन्हा ने अब तक कई उपन्यास लिखे हैं थाम लिया बांहे और पायल इनकी चर्चित उपन्यासों में से एक है थाम लिया बांहे एवं पायल के अलावा भोजपुरी में कई कहानियां भी इन्होंने लिखी है.

पैसा ही पैसा, उपन्यास के केंद्र बिंदु में नायक एक गरीब बच्चा है जिसका नाम प्यारा है. प्यारा बच्चा तीन बहनों में अकेला भाई है घर के काम के अलावा हर काम करता है. गरीबी को नजदीक से देखने और महसूस करने वाले प्यारा को एक दिन एक बूढ़ा व्यक्ति मिलता है जिसकी कोई मदद नहीं करता. प्यारा उसे सहारा देता है और उसे उसके घर पहुंचाने की जिद्द करता है. बातचीत के सिलसिले में प्यारा को वह बूढ़ा व्यक्ति बताता है कि वह यमराज है और लोगों के प्राण को हरता है. यमराज प्यारा के मानवीय व्यवहार से बहुत प्रभावित होते हैं. शुरू में प्यारा डर जाता है की मृत्यु को हरने वाले यमराज से मुलाकात.  यमराज से उसकी दोस्ती हो जाती है. यमराज उसे अपने यमलोक ले जाते हैं, जहां प्यारा की भेंट यमराज की बूढ़ी मां से होती है. उन्हें प्यारा बहुत सम्मान देता है. बूढ़ी मां भी प्यारा को स्वर्ग लोक की बहुत सारी बातें बताती हैं. प्यारा इंद्रलोक भी पहुंच जाता है. इंद्रलोक की खूबसूरती और उसकी भव्यता को देख आश्चर्यचकित हो जाता है. इंद्रलोक के आकर्षण से अपने आप को बचा नहीं पाता. प्यारा अपने साथ लाये अपनी दादी की बांसुरी बांसुरी बजाता हैं. इंद्रलोक में बांसुरी बजा कर इंद्रलोक के राजा इंद्र को वह प्रसन्न कर देता है. इंद्र खुश होकर पुरस्कार स्वरूप प्यारा को बहुत सारा सोना चांदी और हीरा जवाहरात भेंट करते हैं. इंद्र ऊससे इतना प्रभावित हुए कि उसे इंद्रलोक में ही नौकरी दे दी. प्यारा की आर्थिक स्थिति बद से बदतर थी. लेकिन अब पैसा वाला हो गया था.  

   इंद्रलोक में ही प्यारा को रानी परी लाजवंती से भेंट हो जाती है और उससे प्रेम हो जाता है. रानी परी राजवंती प्यारा को परियों के देश में ले जाती है. वहां  प्यारा तरह-तरह के पशु पक्षियों को आपस में इंसान की तरह बात करते हुए देखता है. प्यारा बहुत खुश था उसकी जिंदगी बदल चुकी थी गरीब से अमीर बन चुका था. जीवन ने करवट बदल ली थी. लेकिन जो सच था उससे वह जब रूबरू हुआ तो उसकी पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. प्यारा को एक दिन यमराज ने बताया कि सातवें दिन उसकी मौत हो जाएगी और उसकी मृत्यु को कोई नहीं टाल सकता यहां तक कि मैं यमराज भी नहीं. प्यारा गरीब से अमीर बन बेहतर जीवन जी रहा था उसके अंदर जीने की तमन्ना बढ़ गई थी.

मृत्यु की खबर से प्यारा बेचैन हो उठा था. लेकिन कैसे मृत्यु को डाला जाए इसे लेकर वह सोचने लगा और से पता चला कि उसकी मृत्यु को भगवान ही डाल सकते हैं तो उसने भगवान से मिलने की ठानी. भगवान से उसकी मुलाकात भी हुई. जहां उसे जीवन और मृत्यु के बारे में सच्चाई से रूबरू होना पड़ा. उपन्यास में लेखिका ने भगवान के हवाले से बताने की कोशिश की है कि की हर व्यक्ति को आज नहीं तो कल मृत्यु को गले लगाना ही पड़ता है. प्यारा भगवान से अपनी बात रखने की कोशिश की और कहा कि मेरी तीन छोटी बहनों ने मेरे लिए व्रत रखा था और रस जैसे जैसा होने का आशीर्वाद दिया बूढ़ी मां ने जीते रहो का आशीर्वाद दिया. भगवान ने यह कहा कि तुम्हारी बातें सत्य है. अगर सच्चे हृदय से तुम्हें आशीर्वाद दिया गया है तो आज के सातवें दिन कोई नहीं मार सकेगा. प्यारा ने दोनों हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया और भगवान ने भी उसे आशीर्वाद दिया.

उपन्यास का नायक गरीब प्यारा यमराज से दोस्ती करता है, उसकी जिंदगी बदल जाती है. पैसा ही पैसा,उसके जीवन में आता है. पैसे से जीवन जीने की तमन्ना होने लगती है . मृत्यु को पास देख उसे टालने की कोशिश में वह सफल होता है. यह सफलता उसके द्वारा जरुरत मंद को किये गए मदद और  प्राप्त आशीर्वाद से किया और ईश्वर ने भी उसे आशीर्वाद दिया उसने मृत्यु को भी हरा दिया.

उपन्यास खासतौर से बच्चों को केंद्र में रखकर लिखा गया है .जहां राह पर बूढ़े की कोई मदद नहीं करता वही वह बच्चा प्यारा उसकी मदद करता हैं. उपन्यास बताता है कि हमें हर कमजोर व्यक्ति की मदद करनी चाहिए और उनसे जो हमें आशीर्वाद मिलता है वह हमारे जीवन को मजबूती प्रदान करता है. यह उपन्यास बच्चों को काफी पसंद आएगा क्योंकि इसका ताना बाना फैंटसी की तरह है और काल्पनिक भी हैं. 

पुस्तक- पैसा ही पैसा (उपन्यास) 

लेखक- माधुरी सिन्हा

प्रथम संस्करण-2018

मूल्य- ₹400 (हार्ड बाउंड)

प्रकाशक- नोवेल्टी एंड कंपनी, अशोक राजपथ, पटना-4

 

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सम्पादक

डॉ. लीना