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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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पत्रकारिता की शक्ति को बताने वाली दस्तावेजी पुस्तक है ‘रतौना आन्दोलन : हिन्दू-मुस्लिम एकता का सेतुबंध’

लाजपत आहूजा के संपादन में इस पुस्तक को लिखा है, लेखक लोकेन्द्र सिंह, दीपक चौकसे और परेश उपाध्याय ने

डॉ. गजेन्द्र सिंह अवास्या/ भारत में पत्रकारिता का एक गौरवशाली इतिहास है। समाज जागरण से लेकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता की चेतना जगाने में पत्रकारों एवं समाचारपत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका का …

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पत्रकारिता से कई अपेक्षा रखती डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' की पुस्तक 'पत्रकारिता और अपेक्षाएँ"

अनिता दीपक शर्मा / डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' की पुस्तक 'पत्रकारिता और अपेक्षाएँ' अपने नाम को सार्थक करने के साथ-साथ पाठकों की अपेक्षाओं पर भी पूरी तरह खरी उतरी है। लेखन से ज्ञात हुआ कि पत्रकारिता का इतिहास और आज के समय की पत्रकारिता में ज़मीन-आसमान का अंतर आ चुका है। आज के समय में निष्पक्ष पत्रकारिता एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।वाकई यह पाञ्चजन्य शंखनाद के ही समान है। सांस्कृतिक अखण्डता, परम्पराएँ, राजनैतिक और आध्यात्मिक अस्तित्व और राष्ट्रीयता की संवाहक, संरक्षक, संपोषक भारतीय…

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खबरों के व्यापार में

डॉ अबरार मुल्तानी//

चूंकि हर व्यापार में

फ़ायदा ही मक़सद होता है

इसलिए खबरों के व्यापारियों

का भी खबरों से

बस फ़ायदा ही मक़सद है।

 

खबरों के व्यापार में

व्यापारियों ने अपने

और अपने आकाओं 

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आत्मीयता से ओत-प्रोत स्मृतियां

पुस्तक समीक्षा/ प्रो. कृपाशंकर चौबे/ प्रो. संजय द्विवेदी की उदार लोकतांत्रिक चेतना का प्रमाण उनकी सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘न हन्यते’ है। ‘न हन्यते' पुस्तक में दिवंगत हुए परिचितों, महापुरुषों के प्रति आत्मीयता से ओत-प्रोत संस्मरण और स्मृति लेख हैं। ये स्मृति लेख नई पीढ़ी के लिए दृष्टांत हैं कि अपने समय के आदरणीयों को  श्रद्धांजलि देते समय कैसी उदारता अपेक्षित है। …

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एक राष्ट्रवादी पत्रकार का यूं चले जाना!

सतीश पेडणेकरः स्मृति शेष

निरंजन परिहार/ आईएसआईएस की कुत्सित कामवृत्ति, दुर्दांत दानवी दीवानगी और बर्बर बंदिशों की बखिया उधेड़ता इस्लामिक स्टेट की असलियत से अंतर्मन को उद्वेलित कर देने वाला  लेखा-जोखा दुनिया के सामने रखनेवाले पत्रकार सतीश पेडणेकर संसार को सदा के लिए छोडकर निकल गए। तीन दशक तक जनसत्ता में रहे सतीशजी का अचानक चले जाना यूं तो कोई बहुत बड़ी खबर नहीं, लेकिन स्मृतियों की मीमांसा और मंजुषा कहे जाने वाले मनुष्य की मौत जब…

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अपने तेवर पर कायम जन मीडिया

संचार व पत्रकारिता के सही मायनों से रूबरू कराता, पूरी की दस साल की यात्रा

डॉ. लीना/ संचार और पत्रकारिता की शोध पत्रिका जन मीडिया ने अपने तेवर और सोच को बरकरार रखते हुए अपनी यात्रा के 10 साल पूरे कर लिये हैं । जन मीडिया का 120वां, मार्च 2022 का अंक संचार व पत्रकारिता पर विमर्श पर सार्थक सोच और पारदर्शिता के साथ है।…

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सीरियस खबरें !

अजीत शाही/ पंद्रह साल पहले की बात है. एक न्यूज़ चैनल के मालिक ने मुझे काम पर रखा ये कह कर कि हम न्यूज़ कम कर पा रहे हैं ऊलजलूल ख़बरें ज़्यादा हैं, तुम ज़रा मदद कर दो सीरियस खबरों में. तीन चार हफ़्ते बाद एक स्ट्रिंगर ने एक रिपोर्ट भेजी: कुत्तों का श्मशान. खबर थी कि किसी शहर में कुत्तों का श्मशान है जहां लोग अपने पालतू कुत्ते का मरने के बाद अंतिम संस्कार करते हैं. मैंने कौतुहल के चलते वीडियो देखा तो उसमें पहला सीक्वेंस ये था कि एक हँसता-खेलता कुत्ता अपने मालिक के घर में ठिठोली कर र…

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मीडिया साहित्य की और रचनायेँ--

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सम्पादक

डॉ. लीना