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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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भारतीय मीडिया इस अपमान का प्रतिकार भी नहीं कर सकता!

रवीश कुमार। ट्रंप के बाद अब बाइडन के सामने भी गोदी मीडिया को लेकर अपमानित होना पड़ा मोदी को. "मुझे लगता है कि वे प्रेस को यहां लाने जा रहे हैं। भारतीय प्रेस अमरीकी प्रेस की तुलना में कहीं ज़्यादा शालीन है। मैं सोचता हूं, आपकी अनुमति से भी, हमें सवालों के जवाब नहीं देने चाहिए क्योंकि वे बिन्दु पर सवाल नहीं करेंगे"…

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बेनकाब हुआ पश्चिमी मीडिया का दोगला और दोहरापन

पत्रकारिता के नैतिक मापदंडों पर पश्चिमी मीडिया का दागदार चेहरा

डॉ अजय खेमरिया/ भारतीय जनसंचार संस्थान के एक ऑनलाइन सर्वेक्षण एवं शोध के नतीजे बताते है कि भारत में अधिसंख्य चेतन लोग इस बात को समझ रहे है कि यूरोप,अमेरिका और अन्य देशों की मीडिया एजेंसियों ने कोरोना को ल…

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बहुजन मीडिया की जरूरत, आखिर क्यों ?

संजीव खुदशाह/ मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ। लेकिन मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहलाने के लिए उसका लोकतांत्रिक, विविधता पूर्ण, सोशल बैलेंस से लैस होना चाहिए। लेकिन भारतीय मीडिया किसी राजतंत्र की तरह सिर्फ सवर्णों द्वारा संचालित होती हैं।…

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संभावनाओं भरा है हिंदी पत्रकारिता का भविष्य

30 मई 'हिंदी पत्रकारिता दिवस' पर विशेष

डॉ. पवन सिंह मलिक/ 30 मई 'हिंदी पत्रकारिता दिवस' देश के लिए एक गौरव का दिन है। आज विश्व में हिंदी के बढ़ते वर्चस्व व सम्मान में हिंदी पत्रकारिता का विशेष योगदान है। हिंदी पत्रकारिता की एक ऐतिहासिक व स्वर्णिम यात्रा रही है जिसमें संघर्ष, कई पड़ाव व सफलताएं भी शामिल है। स्वतंत्र…

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पत्रकारिता दिवस का मान बढ़ाया भोपाल-इंदौर ने

30 मई 'हिंदी पत्रकारिता दिवस' पर विशेष

मनोज कुमार/ एक पत्रकार के लिए आत्मसम्मान सबसे बड़ी पूंजी होती है और जब किसी पत्रकार को अपनी यह पूंजी गंवानी पड़े या गिरवी रखना पड़े तो उसकी मन:स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है. फिर आप किसी भी पत्रकार के लिए कोई दिन-दिवस मनाते रहिए, सब बेमानी है. हर साल हिन्दी पत्रकारिता दिव…

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नारद दृष्टि : पत्रकारिता का पथ प्रदर्शक

डॉ. पवन सिंह मलिक/ आज पूरा विश्व भारत की ओर आशा भरी नजरों से देख रहा है, क्योंकि भारत ही विश्व को सही दिशा और दशा देने की क्षमता रखता है। ऐसे में लोकतंत्र का चौथा  स्तम्भ होने के कारण मीडिया जगत की भूमिका और अधिक बढ़ जाती है कि विश्व के समक्ष अपने राष्ट्र की कैसी तस्वीर प्रस्तुत  की जाए। भारत हमेशा से ही ज्ञान आराधक राष्ट्र रहा है। भारत की ज्ञान परंपरा औरों से विशेष इसलिए …

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डिजीटल ट्रांसफार्मेशन के लिए तैयार हों नए पत्रकार

नए समय में मीडिया शिक्षा की चुनौतियां

प्रो. संजय द्विवेदी/ एक समय था जब माना जाता है कि पत्रकार पैदा होते हैं और पत्रकारिता पढ़ा कर सिखाई नहीं जा सकती। अब वक्त बदल गया है। जनसंचार का क्षेत्र आज शिक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। वर्ष 2020 को लोग चाहे कोरोना महामारी की वजह से याद करेंगे, ले…

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दैनिक भास्कर का फर्जीवाड़ा!

अनिल सिंह / क्या यह प्रायोजित खबर नहीं है? क्या प्रेस को ऐसी स्वंतंत्रता मिलनी चाहिए? 

अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर भास्कर के अलग-अलग शहरों के 03 मई 2021 के एडिशन में एक ही तरह का बयान अलग-अलग डॉक्टर्स के नाम से उनकी (अलग-अलग) तस्वीर के साथ छपा है। क…

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बेमानी है प्रेस फ्रीडम की बातें

पूरी दुनिया में पत्रकार बेहाल हैं और प्रेस बंधक होता चला जा रहा है

मनोज कुमार/ तीन दशक पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने 3 मई को विश्व प्रेस फ्रीडम डे मनाने का ऐलान किया था. तब से लेकर आज तक हम इसे पत्थर की लकीर मानकर चल रहे हैं. इन तीन दशकों में क्या कुछ हुआ, इसकी मीमांसा हमने …

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'ग़ुलाम मीडिया ' जनता की बदहाली का सबसे बड़ा ज़िम्मेदार

निर्मल रानी/  हमारा देश इस समय संकट के किस भयानक दौर से  गुज़र रहा है इसे दोहराने की ज़रुरत नहीं। संक्षेप में यही कि जब देश प्यास से मर रहा है उस समय सरकारें कुंवे खोदने में लगी हैं। और इन कुंओं को खोदते खोदते कितनी और जानें काल के मुंह में समा जाएंगी इसका कोई अंदाज़ा नहीं है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे चंद लोग भले ही अपने अहंकारवश अपनी नाकामियों और ग़ैर ज़िम्मेदाराना फ़ैसलों पर पर्दा डा…

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सम्पादक

डॉ. लीना