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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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समीक्षा की समीक्षा

मीडियामोरचा में कैलाश दहिया ने “समकालीन हिन्दी दलित साहित्य: एक विचार विमर्श’’ नाम की पुस्तक की समीक्षा की  

अजय चरणम्/ वरिष्ठ लेखक सूरजपाल चैहान की ‘‘समकालीन हिन्दी दलित साहित्य: एक विचार विमर्श’’ नाम की पुस्तक की समीक्षा वरिष्ठ आलोचक कैलाश दहिया की पढ़ी - मीडियामोरचा में । समीक्षा पढ़कर मैं काफी प्रवाहित हुआ क्योंकि यह समीक्षा मात्र समीक्षा नहीं है, बल्कि अपने आप में एक पूरी दस्तावेज है, हिन्दी दलित साहित्य का दस्तावेज । पूरी समीक्षा पढ़ने के बाद एक स्पष्ट तस्वीर सामने आने लगती है, जिसमें दिखने लगता है दलित साहित्य का भूत, वत्र्तमान और भविष्य । दहिया साहब ने बड़ी सूक्ष्मता से तीनों तस्वीरें (भूत, वत्र्तमान और भविष्य) उतारी हैं । उन्होंने चैहान साहब के माध्यम से बताया है कि लिखना जरूरी है, बहुत जरूरी है अगर हम नहीं लिखेंगे तो हमारा दस्तावेज कैसे बनेगा । आज हमारे पास दस्तावेज का अभाव है । हमारा आन्दोलन बड़ा है लेकिन दस्तावेज बड़ा नहीं है । दस्तावेज का अभाव है । स्वामी अछूतानन्द के आदि हिन्दू आंदोलन और बाबा मंगूराम के आद धर्मी आन्दोलन का दस्तावेजीकरण कर लिया होता, तो आज बात कुछ और होती ।

समीक्षक दहिया साहब ने महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर के साथ आकादमी में घटी अप्रिय घटना का जिक्र किया है जो उनके डॉ.  साहब के साक्षात्कार के बाद घटी थी । समीक्षक ने अहिस्ते-अहिस्ते बहुत सारे पहलू को छूआ है । अम्बेदकर की लेखनी को घेरे में लिया है, तो ओम प्रकाश बाल्मीकि के इरादे को समझने का प्रयास किया है ।

महान धनुषधारी एकलव्य और साधक शम्बूक के सहारे भी दस्तावेजीकरण की जरूरत को बताया है तो वहीं सदगुरू रैदास और कबीर साहेब के माध्यम से ब्राह्मणों की प्रक्षिप्त मंशा को रखा है।

समीक्षा की एक-एक पंक्ति की समीक्षा की जा सकती है, तभी तो मैंने समीक्षा को दस्तावेज कहा है । इसके लिए वरिष्ठ लेखक सूरजपाल चैहान और समीक्षक कैलाश दहिया साहब को बहुत-बहुत धन्यवाद ।

अजय चरणम्

पूरब आजीमगंज

हवेली खड़गपुर

811213, मुंगेर (बिहार)

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सम्पादक

डॉ. लीना