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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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वंचितों की आवाज ‘सोशलिस्ट फैक्टर’

संजय कुमार/ अंतरराष्ट्रीय स्तर के लेखक, बायोग्राफर और संपादक फ्रैंक हुजूर यों तो अपनी पुस्तकों- टीपू स्टोरी, सोहो-जिस्म से रूह तक का सफर , हिटलर लव विद मैडोना, इमरान V/S इमरान से खासे चर्चित रहे हैं। खास कर बायोग्राफी लेखक के तौर पर इनकी पहचान अंतरराष्ट्रीय पटल पर है। लेकिन लेखन के अलावा कुशल संपादक की भूमिका में भी अब वे चर्चे में है। मासिक पत्रिका अंग्रेजी ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ और हिन्दी में साप्ताहिक अखबार ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ के वे प्रधान संपादक हैं।

हिन्दी साप्ताहिक अखबार ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ के अब तक प्रकाशित 16 अंकों के तेवर को देखने से अखबार की तस्वीर साफ दिखती है कि वह किसके पक्ष में खड़ा है। जाहिर है आज का मीडिया ब्राह्मणवादी सोच के साथ खड़ा है तो वहीं ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ सामाजिक विचारधारा के साथ खड़े हो कर समाज के वंचितों की वकालत करता दिखता है। अखबार के ताजा अंक 28 अगस्त से 4 सितंबर में दाना मांझी को कवर स्टोरी बनाया गया है। ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ ने बुलंद भारत की बेबसी की तस्वीर शीर्षक दिया है। रघुबीर सहाय की कविता ‘अधिनायक’ भी दाना मांझी यानी गरीब जनता की बेबसी को रेखांकित करता है। कविता को मुख्य पृष्ठ पर जगह दी गयी है।

 ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ का 15वां अंक सोशल जस्टिस के महान योद्धा बी.पी.मंडल पर केन्द्रित है। जबकि 14 वां अंक आजादी के बाद मंडल आयोग और राजनीतिक क्रांति पर केन्द्रित है। रामबहादुर राय द्वारा संपादित पुस्तक ‘सफरनामा’ जिसमें मंडल मसीहा से चर्चित पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह के संस्मरण को कवर स्टोरी बनाया गया है। यह  विश्वनाथ प्रताप सिंह की सामाजिक सोच को रेखांकित करता है. उनकी सोच को जताता है कि वे पिछड़ों के समुचित विकास के प्रति कितने गंभीर थे। वहीं 13 वां अंक का कवर स्टोरी महंगाई पर फोकस होते हुए, गुजरात के दलित आंदोलन के नायक जिग्नेश मेवानी को सामने लाता है।

‘सोशलिस्ट फैक्टर’ का हर अंक अपने आप में महत्वपूर्ण है। राजनीतिक और सामाजिक सोच को धरातल पर लाने की पूरजोर कोशिश करता है। साथ ही जो भी सोशल फैक्टर हैं उसे मुद्दा बनाने से नहीं हिचकता।

प्रधान संपादक फ्रैंक हुजूर ने अपने संपादकीय का नाम ‘माटी का ख्वाब’ दिया है। इसमें देश में घटित महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे अपनी कलम चलाते हैं। प्रधान संपादक की संपादकीय में भले ही  मुद्दा मौजू हो उसमें सामाजिक सोच का पुट साफ दिखता है।

टेबुलाइट अखबार ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ की छपायी और पृष्ठ सज्जा आर्कषक है। ग्लौसी पेपर में छपने से यह बेहतर दिखता है। ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ अपने तेवर से ब्लिज की याद दिला जाता है। 12 पृष्ठ का यह अखबार पाठक के खुराक के हिसाब से कम पड़ रहा है। जहाँ  सामाजिक और वंचितों के सरोकार को मुख्य धारा की मीडिया जगह नहीं देती वैसे में एक ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ की नहीं बल्कि कई ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ अखबारों की जरूरत है। बहरहाल, ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ अपने मकसद के साथ आगे बढ़ रहा है। इसकी आवाज लोगों तक पहुंच रही है।

अखबार-‘सोशलिस्ट फैक्टर’, हिन्दी साप्ताहिक

प्रधान संपादक- फ्रैंक हुजूर

वर्ष-01

मूल्य-10 रुपये

संपादकीय-बी/5, दिलकुशा कालोनी,

लखनऊ-226002, उत्तर प्रदेश

 

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सम्पादक

डॉ. लीना