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मीडियामोरचा

___________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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कफन के पूर्व शाल ओढ़ने की इच्छा क्या पूरी होगी...?

भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी / मैं भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी, यदि संपादकों से मलाल करूँ कि वह लोग मेरे लेखादि प्रकाशित करने के एवज में कुछ नहीं देते हैं तो शायद कितनों को यह अटपटा लगेगा और कुछेक एडिटर तो लेखों को ‘डस्टविन’ में डाल देंगे। मैं किसी संस्था का मुलाजिम नहीं स्वतंत्र लेखन कार्य करता हूँ। लोगों से सुना है कि नामचीन लेखकों को छोड़कर किसी अन्य के लेख एवं संवादों के प्रकाशन पर प्रकाशक/संपादक एवं संस्थाओं के प्रबन्ध तन्त्र की तरफ से किसी भीं प्रकार का पारिश्रमिक ‘देय’ नहीं अनुमन्य किया गया है। बस लिखो, अपनी फोटो छपवा लो जवानी, बुढ़ापा सफल हो जाएगा। नाम कमाओ पैसों की फिक्र छोड़ो।

काश! मैं किसी संस्थान में वेतनभोगी मीडिया कर्मी होता तो इस समय अच्छी पगार पाता। घर-परिवार के लोग सीधे मुँह बातें तो करते। समाज में प्रतिष्ठा होती-अच्छा घर, घोड़ा गाड़ी और भी सब कुछ होता जो होना चाहिए। बहरहाल समय गुजर गया है अब तो बस छूँछी पैलगी जिव झन् नही हो रहा है। मिलने जुलने वाले जो हैं भी वे भी एक 50 पैसा वाला गुटखा भी नहीं खिलाते, बस प्रशंसा के पुल बाँध कर मेरे भौतिक शरीर को ‘वैतरणी’ पार लगाते हैं। आज हमें बताया जाता है कि 21वीं सदी चल रही है। चलिए हम मान भी लेते हैं। प्रकृति अपने को परिवर्तित करती रहती है, इतिहास दुहराता है तो क्या हम ‘आदिमयुग’ में तो नहीं जा रहे हैं-? क्योंकि एवरेस्ट जैसी उच्चतम चोटी पर पहुँचने के बाद हर किसी को पुनः धरातल पर ही आना पड़ता है वह चाहे एडमण्ड हिलैरी, शेरपा तेनसिंग या फिर बछेन्द्री पाल अथवा संतोष यादव हों।

पिछले कई वर्षों से यह तमन्ना रही कि ईहलोक गमन के पूर्व किसी प्रकाशक/ संपादक/ संस्थान प्रबन्धतन्त्र द्वारा पुरस्कृत किया जाऊँ? बहुत लिखा है जिस स्तर का लेखन रहा, उसे पाठकों ने पढ़ा भी है, सराहा है, लेकिन एक शाल और प्रशस्ति पत्र तथा गाँधी बाबा छपा कोई एकाध कागज का टुकड़ा पुरस्कार में नहीं मिला है। एक सीनियर हैं-प्रायः उनसे भेंट मुलाकात होती रहती है। प्रसंगवश वार्ता छिड़ने पर वह कहते हैं बच्चू कलम घसीट संस्थाएँ अभी तुम्हारे शरीर को शाल से क्यों ढँकें-जीवित हो मरोगे तो दो गज जमीन के नीचे दफन अथवा चिता की अग्नि में भस्मीभूत होने के पूर्व शाल से भी लम्बा वस्त्र देंगे। चिन्ता मत करो तुम्हारे विरोधी मीडिया कर्मी मारे खुशी में लिखेंगे कि भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी नहीं रहे। वह अपने जीवन भर स्वयं से लड़ते रहें, समाज की व्यथा को अपनी पीड़ा समझ कर लिखते रहें वह बड़े जुझारू एवं मुफलिस कलमघसीट थे। फिर एक मनगढ़न्त आपात बैठक करके श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ-साथ शोक संवेदनाओं से कामल भर देंगे। मरने के बाद ही यह सब कुछ होगा उसके पहले नहीं। मैं सीनियर की बातों को सहज ढंग से मान लेता हूँ। मैं कोई नामचीन ‘हैसियत’ नहीं। लिखना-पढ़ना तो यह लगभग सभी जानते हैं मैं किस खेत की मूली जो लिख दिया वह ‘अकाट्य’ हो। बहस करने वाले तर्क नहीं ‘कुतर्क करने लगते हैं। तीसमार खाँ के अन्दाज में हाई टेक युग के राइटर/ क्रिटिक्स बनते हैं। मुझे तो उनके बहस में लोमड़ी सी चालाकी और दि ग्रेट चाटुकार की ‘स्पूनिंग’ सुस्पष्ट परिलक्षित होती है।

बहरहाल सब को अपने तरीके से जीने की ‘स्वतच्छन्दता’ है। मैं किसी की लाइफस्टाइल बदल ही नही सकता। एक कहावत है कि टेढ़ी पूँछे कभी सीधी नहीं होतीं, मैं सीधा करने का प्रयास भी नहीं करता (अपनी नहीं औरों की)।25 वर्ष पहले की बात है। एक मास्साब थे नाम था डॉ0 स्वामी नाथ पाण्डेय। फैजाबाद के ‘रामभवन’ में गुमनामी बाबा के नाम से रहे महात्मा जी की मृत्यु उपरान्त उन्हें लोगों ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस कहा। नए लोग फैजाबाद से प्रकाशित होने वाला एक अति निर्भीक निष्पक्ष अखबार था उसमें गुमनामी बाबा से सम्बन्धित खबरें कई किश्तों में छपी। डॉ0 पाण्डेय जी नेताजी के पास परम अनुयायी थे, वह बस स्टेशन फैजाबाद से सटे पश्चिम तरफ रामभवन के बाहर तत्कालीन जिला प्रशासन की कारगुजारियों पर दर्जनों साथियों के साथ डेरा डाले थे, लेकिन माइट इज राइट यानि ‘‘जिसकी लाठी भैंस उसी की’’ प्रशासन ने रामभवन से मिले गुमनामी बाबा के सामान को ‘सीज’ कर कचेहरी में स्नान तालों के भीतर रखवा दिया। उस समय जनमोर्चा नामक समाचार-पत्र के सम्पादक नए लोग की खबर से बौखला गए क्योंकि इस प्रकरण से नए लोग (संपादक दिनेश माहेश्वरी जिनकी बाद में मृत्यु का समाचार मिला और नए लोग का प्रकाशन बन्द हो गया, अशोक टण्डन की रिपोर्ट्स, कुछेक और पत्रकार भाई थे नाम नहीं याद आ रहा है लगातार तथ्यों/साक्ष्यों के साथ छपने से) रातों रात लोगों द्वारा हाथों हाथ लिया जाने लगा जनमोर्चा हिन्दी दैनिक जैसा पुराना समाचार-पत्र नम्बर दो पर हो गया था। शीतला सिंह संपादक कोलकाता तक गए और लौटकर लिखा कि ‘नए लोग’ में छपने वाली गुमनामी बाबा से सम्बन्धित खबरें बकवास हैं (आल द रबिश) कुछ इसी तरह के कमेन्ट्स तत्कालीन फैजाबाद के डी0एम0 इन्दु कुमार पाण्डेय ने की थी। उस समय मुझ जैसे लोगों की रिर्पोट्स से खुश होकर डॉ0 पाण्डेय ने कहा था कि बेटा भूपेन्द्र जब मैं मरूँगा तो ये अखबार वाले किसी कोने में खबर छाप कर खाना पूर्ति कर देंगे। वह इसलिए कि जब गुमनामी बाबा जैसे प्रकरण को झूठा सिद्ध किया जा रहा है तब स्वामीनाथ पाण्डेय की क्या बिसात। इतना कहकर वह भावुक होकर रोने लगे थे। एक अर्सा हो गया, मेरे लेख, कविताएँ, व्यंग्यादि सामग्रियाँ जनमोर्चा में छपा करती थीं, तत्समय जनमोर्चा पाठकों उससे सम्बद्ध लेखकों/ पत्रकारों की जुबान पर मेरा नाम रहा करता था, अब वह संस्था भी हाईटेक हो गई है, आर्टिकिल्स भेजने के बाद प्रे, निवेदन, अनुरोध, आग्रह करना पड़ता है। उसमें लिखना बन्द कर दिया।

एक पत्रकार ने कहा था कि जनमोर्चा स्वयं सहकारिता पर आधारित समाचार-पत्र है यह तो सहयोग लेता है लेखन/रिपोर्टिंग के एवज में कुछ नहीं देता। बात समझ में आ गई थी, लेकिन उस कथित लोकल न्यूज पेपर में लेखादि छपने के लिए भेज देता था। छपते थे लोग पढ़ते थे एक दशक से यह कार्य भी बन्द कर दिया। हाँ तो मैने बात शुरू किया था कि क्या मैं भी कभीं किसी अखबार, पत्रिका या संस्था द्वारा सम्मानित किया जाऊँगा? पाठकों बता दूँ कि हिन्दी के लगभग सभी लोकप्रिय और स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में छपने का सौभाग्य प्राप्त होने के बावजूद अभी तक पुरस्कृत होने से वंचित हूँ। मैं मरने से पूर्व शाल ओढ़ना चाहता हूँ, प्रशस्ति-पत्र एवं महात्मा गाँधी जी की फोटो वाली हरी, लाल, पीली आई0एन0आर0 हाथों मे पकड़ कर खाली पाकेट (जेब) में रखना चाहता हूँ। वर्षों पूर्व वाराणसी के गाण्डीव, जनवार्ता, जौनपुर के तरूणमित्र, सनराइज, दैनिक मान्यवर में खूब लिखा है ‘मान्यवर’ में अब भी छपता हूँ। कई वेब पोर्टल पर भीं पिछले वर्षों से छपने लगा। प्रदेश की राजधानी से 30 वर्ष पूर्व प्रकाशित होने वाले कई समाचार-पत्र जो अब बन्द हो चुके हैं, उनमें भी खूब लिखा है। मुम्बई से प्रकाशित चर्चित समाचार पत्र में लम्बे संवाद/कविताएँ छपी हैं, कई पत्रिकाएँ भीं प्रकाशित होना बन्द हो चुकी हैं। मैनें उनमें भी लिखा है, कुछेक हैं जिनमें प्रकाशित लेखों के 50/60 रूपए प्रति लेख पारिश्रमिक भी पा चुका हूँ। लेकिन इधर अब कुछ भी हाथ नहीं लग रहा है। दैनिक जागरण लखनऊ 79-84 में 60 रूपए पोस्टेज चार्ज मिलना था। कागज, रिफिल आदि प्रेस कार्यालय से प्राप्त होते थें, तब की बात ही कुछ और थी। डॉ0 मुकुन्द देव शर्मा जी स्थानीय संपादक दैनिक जागरण लखनऊ थे। मैं जागरण में (79-84) लिखता था रिपोर्टिंग करता था, सोचा एक एजेन्सी खुलवा दूँ तो लोग मेरे संवाद/आलेख पढ़ेंगे, मैं पापुलर हो जाऊँगा। एक युवक को लेकर गया, स्व0 डॉ0 शर्मा जी ने मुझे बुलाया और डाँट पिलाते हुए कहा कि तुम और हम पत्रकार लेखक हैं। यह कारोबार पूर्णचन्द और नरेन्द्रमोहन का है वह लोग प्रचार-प्रसार कराएँ। बहरहाल बात वहीं समाप्त हो गई। वह युवक आज स्वयं का समाचार-पत्र प्रकाशित करता है और मेरा उस तत्कालीन एजेन्ट से कोई सम्बन्ध नहीं है। अन्त में मैं अपने भाई श्री ओमप्रकाश जायसवाल (सम्पादक, दैनिक मान्यवर), कैलाशनाथ (संस्थापक/ संपादक, तरूणमित्र), गाण्डीव के राजीव अरोड़ा, जनवार्ता के तत्कालीन सम्पादक स्व0 ईश्वरदेव मिश्र के स्थान पर आरूढ़ सम्पादक,  भारतदूर के संपादक सहित तमाम वेब पोर्टल्स के संपादकों विशेष तौर पर रीता डब्ल्यू.डब्ल्यू.डब्ल्यू डॉट रेनबोन्यूज डॉट इन से अब भी आस लगाए हुए हैं कि मुझे मरणोपरान्त नहीं अपितु उसके पूर्व शाल, प्रशस्ति-पत्र और गाँधी बाबा की फोटो छपी नोट मेरे हाथों में रखकर सम्मानित कर दें ताकि मरने के बाद इन सब चीजों के लिए ‘आत्मा’ को भटकना न पड़े। क्या ऐसा होगा यदि हाँ तो मैं यशवन्त भड़ास 4 मीडिया डॉट काम के सी0ई0ओ0 का शुक्रगुजार रहूँगा कि उन्होंने मेरे आलेखों को छापकर पुरस्कार पाने का हकदार बना दिया। बस अब इतना ही।

 

 

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना