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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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सोशल मीडिया आपके जेहन में जहर तो नहीं भर रहा?

एम. अफसर खान 'सागर'/ वैश्विक महामारी कोरोना के दौर में जब समूचा विश्व जीवन बचाने का संघर्ष कर रहा है बावजूद इसके सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर धर्म, नस्ल, सम्प्रदाय, जाति के नाम पर नफ़रतों का बाज़ार गर्म है! ऐसे में हमें यह सोचने की जरूरत है कि कहीं सोशल मीडिया हमारे जीवन में जहर तो नहीं घोल रहा? सतर्क व सावधन रहें! धार्मिक, साम्प्रदायिक व जातिवादी वाद- विवाद में न पड़ें? व्यक्ति किसी भी धर्म, दल या विचारधारा को चुनने को आज़ाद है। मगर उनकी यह भी जिम्मेदारी बनती है कि सामने वाले का भी सम्मान करे! धर्म आचरण का विषय है, सेवक धर्म उसकी मान्यता के अनुसार श्रेष्ठ है। हमें सबका आदर करना है! सोशल मीडिया पर कोई सूचना फॉरवर्ड करने से पहले सौ बार सोच लें कि यह सही तो है, इससे किसी की भावना तो नहीं आहत होगी? आपसी रिश्ता बरकरार रखें! क्योंकि मुश्किल में आपका पड़ोसी ही काम आयेगा चाहे उसका धर्म या जाति कोई हो!

कुछ दिन की ही तो है जिंदगी, सिलते रहें बकौल गुलजार साहब...

थोड़ा सा रफू करके देखिए ना

फिर से नई सी लगेगी

जिंदगी ही तो है

एम. अफसर खान 'सागर' लेखक,स्तम्भकार, पत्रकार, समीक्षक हैं

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना