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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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पटना प्रलेस का पुस्तक विमर्श आयोजन

इस शहर के लोग’ साहित्य जगत के लिए नायाब तोहफा..

रविवार को पटना प्रगतिशील लेखक संघ ने स्थानीय ’केदार भवन’ में ‘इस शहर के लोग’  (कविता संग्रह) और कवि मानिक बच्छावत की रचनात्मकता पर विमर्श अयोजित किया। विमर्श में मानिक बच्छावत के कविता संग्रह ‘इस शहर के लोग’ के हिन्दी और उर्दू संस्करण पर आसिफ़ सलीम, शहंशाह आलम, परमानंद राम, विभूति कुमार, अशोक सिन्हा, कामरेड हबी-उर-रहमान, कुमार संजीव आदि वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे, संचालन अरविन्द श्रीवास्तव ने किया।
आसिफ सलीम ने कहा कि बाजारवाद और महानगरीय भागमभाग में देशज संवेदनाओं को बचाये रखने की जिजीविषा मानिक बच्छावत की कविताओं में दिखती है। ‘इस शहर के लोग’ का उर्दू संस्करण कवि की समाज के प्रति प्रतिवद्धता को उजागर करता है।
कवि शहंशाह आलम ने कहा कि मानिक बच्छावत की कविताएं बहुविध हैं ये कविताएं हमारे काव्य विकास में अपना गहरा और बड़ा स्थान रखती है। उम्र के इस मुकाम पर ‘जड़’ के प्रति उनका सम्मानपूर्वक स्नेह, प्रेम व उदगार अचानक नहीं फूटा है। फीजी, मारीशस और सुरीनाम सदृश्य देशों में फैले सभी सचेतन नागरिक अपने इतिहास से उतना ही जुड़ाव महसूस कर सकते हैं  जितना मानिक बच्छावत।
परमानंद राम नें उनकी ‘मेहतरानी’ कविता को रेखांकित किया -........ मेरी पत्नी आए दिन उसे / कुछ न कुछ देती है / कहती / उसका कर्ज इस जन्म में / नहीं चुकेगा / राधारानी भी कहती / अपना फर्ज निबाहेगी / जब तक जिएगी / बाईसा की हवेली पर आएगी। उन्होंने कहा कि संग्रह में वर्णित ग्राम्य व आंचलिक शब्दों की बहुलता को जन से जुड़ने की कवि की लालसा के रूप में देखा जा सकता है। अरविन्द श्रीवास्तव ने कहा कि बीकानेर की महान विरासत में जो साझी संस्कृति रही है उसकी मिसाल ‘पीरदान ठठेरा’ में दिख जाता है - पीरदान / आधा हिंदू था आधा मुसलमान / वह ठठेरा कहता मैं /  इस बर्तनों की तरह हूँ जिनका / कोई मजहब नहीं होता। वहाँ ‘हसीना गूजर’ बेरोक-टोक लोगों तक / दूध पहूँचायेगी / कौमी एकता का गीत गायेगी। इस संग्रह को कवि ने  अपनी माटी  (बीकानेर) को समर्पित कर उऋण होने का प्रयास किया है वह स्तुत्य है। मानिक बच्छावत देश के चर्चित कवि रहे हैं, इनकी कविताएं तमाम स्तरीय पत्रिकाआ में प्रकाशित होते रही है ‘इस शहर के लोग’ का हिन्दी के पश्चात उर्दू में संस्करण का आना साहित्य जगत के लिए एक नायाब तोहफा-सा है।
 इस अवसर पर कुमार संजीव व अशोक सिन्हा ने भी अपने-अपने विचार रखे..।

 

 

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना