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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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गजलकार वसन्त की स्मृति में ‘ एक शाम कवयित्री शांति यादव के नाम’

चिडि़या ठगी, उदास शहर में /बाज हुए लो खास, शहर में।‘वो जो भेजे गए थे वतन के लिए /उनकी जद्दोजहद है कफ़न के लिए। इस महान राष्ट्र का अधिकृत विक्रेता हूँ /यारों मैं नेता हूँ...॥ 

मधेपुरा। रविवार को कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अम्बिका सभागार में कवयित्री डा. शांति यादव के एकल काव्य पाठ का आयोजन किया गया। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ ने की। यह कार्यक्रम सम्मेलन के दिवंगत उपाध्यक्ष गज़लकार वसन्त की स्मृति में आयोजित था। विषय प्रवेश करते हुए अध्यक्ष श्री शलभ ने डा. शांति यादव के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला । उन्होंने  कहा कि सामाजिक विसमता, राजनीतिक पाखंड, हिंसा, कुंठा, बड़बोलेपन आदि के विरूद्ध इस कवयित्री ने जो शब्दों के वाण छोड़े हैं वे अचूक हैं, वे अपने अंतर्मन में महादेवी के रहस्यवाद को समेटे तथा सुभद्राकुमारी चैहान के प्रगतिवाद को संजोये एक सक्षम कवयित्री के रूप में परिचित हैं। इनके हृदय को विधाता ने ज्वाला से सिरजा है। इनकी रचनाओं में मानवता की सनातन भावद्वंद्वता की अभिव्यक्ति है, कुछ नूतन रूप में, कमनीयगेयता के साथ ही सशक्त भाषा में। 
‘जिसने लूटा देश ये सारा जग जाने
मिलते नहीं सबूत हमारे संसद में’
शांति यादव की ये पंक्तियाँ बुद्धिजीवियों के कंठ में विराजती है। 
इसके पूर्व कवयित्री का जीवन परिचय देते हुए सम्मेलन के सचिव डा. भूपेन्द्र नारायण ‘मधेपुरी’ ने आगत सदस्यों का स्वागत किया। उन्होंने कहा दिवंगत वसन्त कोसी अंचल में गज़ल के बादशाह थे । उन्होंने वसन्त की कई गजलों को संदर्भित करते हुए कहा कि मधेपुरा समाजवादी धरती है और ऐसी धरती पर ही जनवादी कविता का जन्म हुआ करता है, उन्होंने गजलकार वसन्त की कुछ पंक्तियों को पेश किया -
‘किस तरह जी रहे हैं सुनो बादशाह !
हम जहर पी रहे हैं सुनो बादशाह’!!’
तथा 
‘लगने लगा है बिस्तर बाहर दलान में
बूढ़े के लिए अब नहीं कमरा मकान में’’
 
मंच पर उपस्थित मंडल विश्वविधालय के नवनिर्वाचित अभिषद सदस्य श्री विधानंद यादव एवं  कवयित्री शांति यादव को समारोह के अध्यक्ष ने अंगवस्त्रम् प्रदान कर सम्मानित किया। 
डा. शांति यादव ने अपनी बीस दमदार गज़ल व लगभग दस नज्मों का पाठ कर उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। देखें कुछ बानगी - 
‘बंद पिजरों से परिन्दों को उड़ाया जाये
  जश्न आजादी का कुछ इस तरह मनाया जाये।
बैठे ठाले दिन कटता है, संसद-सत्र चलाओ जी
जनता बूझे नहीं निकम्मा, कुछ हलचल मचाओ जी।
हंडी में फिर पत्थर खदका
बच्चा थोड़ी देर को चहका
मां ने ली झूठी अंगराई
मानो घर खुश्बू से महका।
 
कवयित्री ने नारी सशक्तिकरण, बाजारवाद के दुष्प्रभाव तथा समाज में व्याप्त अराजकता को रेखांकित करते हुए अपने व्यंग्य से उसका पर्दाफास किया। 
पूर्व उपकुलपति डा. कौशलकिशोर मंडल, प्रो. मणिभूषण वर्मा एवं वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रकिशोर यादव तथा विधानंद यादव ने कवयित्री के काव्य पाठ की साहित्यिक समीक्षा की तथा आशीर्वचन दिए।  अन्य वक्ताओं में डा. अशोक कुमार,  विनीत उत्पल, उल्लास मुखर्जी , जयप्रकाश यादव, श्यामल किशोर यादव एवं अरविन्द श्रीवास्तव आदि थे। अंत में डा. मधेपुरी ने धन्यवाद ज्ञापन किया ।

 

 

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सम्पादक

डॉ. लीना