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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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लेखकों का नपुंसक गुस्सा

संदर्भ- विरोधस्वरूप पुरस्कार वापसी का 

वेद प्रताप वैदिक । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बयान दे दिया। अखलाक और गुलाम अली दोनों के साथ हुई घटनाओं को उन्होंने ‘अवांछित और दुर्भाग्यपूर्ण’ कह दिया। अब बताइए, हमारे साहित्यकार मित्र क्या करेंगे? मोदी ने उन्हें असमंजस में डाल दिया। अब वे क्या अपने सम्मान या पुरस्कार वापस मांगेंगे?

मोदी ने बड़ी चालाकी से काम लिया। पहले सब साहित्यकारों को सम्मान लौटाने दिया। मोदी ने सोचा होगा कि 15-20 दिन में हजार-पांच सौ तो लौटा ही देंगे। बाद में वे सबको मसखरा सिद्ध कर देंगे लेकिन मोदी की यह इच्छा पूरी नहीं हुई। मुश्किल से 50 साहित्यकार भी नहीं जुटे। वे साहित्यकार हैं। सीधे-सादे हैं। बस 50 के लगभग ही भेड़चाल में फंस गए। उन्हें क्या पता था कि उन्हें लेने के देने पड़ जाएंगे।

अब साहित्य अकादमियां उन्हें बुलाकर उनके सम्मान तो वापस नहीं करने वाली हैं। बेचारों के सम्मान भी गए और लाख-लाख रु. भी। नयनतारा सहगल ने एक लाख का चेक वापस भेजा तो दो-तीन लेखकों को भी भेजना पड़ा। असली नुकसान यही हुआ। वैसे सम्मान लौटाने से कोई नुकसान नहीं हुआ। फायदा ही हुआ। जब उन्हें सम्मान मिला था तो किसी कोने में छोटी-मोटी खबर छपी होगी। अब जब उन्होंने लौटाया तो बड़ी खबर बनी। अखबारों और टीवी चैनलों पर भी! अब वे अपने जीवन-वृत्त (बायोडेटा) में सम्मान लौटाने की बात जरुर कहेंगे, जिसमें यह छिपा होगा कि उन्हें यह सम्मान मिला था। याने पाना और लौटाना एक बराबर हो गया। नौटंकी सिद्ध हो गया। अखलाक की हत्या घोर अनैतिक कुकर्म था, इसमें ज़रा भी शक नहीं है लेकिन उसका साहित्य अकादमी से क्या लेना-देना था? लेखकों का कहना है कि साहित्य अकादमी ने उसकी निंदा क्यों नहीं की? या अकादमी द्वारा सम्मानित दांभोलकर पर वह चुप क्यों रही? प्रश्न यह है कि अखलाक और दांभोलकर जैसे कांड क्या पहली बार हुए हैं? और दांभोलकर की हत्या तो सोनिया-मनमोहन काल में हुई थी। क्या साहित्य अकादमी का ऐसे सब मामलों में टांग अड़ाना उचित है? उस समय सम्मान लौटाने वालों को भेड़-चाल चलने की नहीं सूझी। अकेले उदयप्रकाश ने सत्साहस किया।

हमारे साहित्यकार खुद बड़े अवसरवादी और दब्बू लोग हैं। पुरस्कारों और सम्मानों के लिए मामूली नेताओं और अफसरों के तलवे चाटते फिरते हैं। अब वे भारत में तानाशाही की शिकायत करते हैं। मोदी की दादागीरी का दबे-छिपे ढंग से इशारा करते हैं। साफ लिखने और बोलने की हिम्मत उनमें नहीं है। यदि उन्हें मोदी या उसकी पार्टी या उसके समर्थकों पर गुस्सा है तो उसे लिखकर, बोलकर और प्रदर्शन करके निकालें। यह पुरस्कार लौटाना तो नपुंसक गुस्सा है। यह बात बिल्कुल झूठी और बनावटी है कि देश में तानाशाही का माहौल है। आपातकाल में इन लोगों की घिग्घी बंधी हुई थी। मेरे जैसे सैकड़ों लेखक और विचारक तब भी डटकर अपनी बात कहते थे और अब भी कहते हैं। कोई तानाशाही लाने की हिम्मत तो करे?

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सम्पादक

डॉ. लीना