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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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'ग़ुलाम मीडिया ' जनता की बदहाली का सबसे बड़ा ज़िम्मेदार

निर्मल रानी/  हमारा देश इस समय संकट के किस भयानक दौर से  गुज़र रहा है इसे दोहराने की ज़रुरत नहीं। संक्षेप में यही कि जब देश प्यास से मर रहा है उस समय सरकारें कुंवे खोदने में लगी हैं। और इन कुंओं को खोदते खोदते कितनी और जानें काल के मुंह में समा जाएंगी इसका कोई अंदाज़ा नहीं है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे चंद लोग भले ही अपने अहंकारवश अपनी नाकामियों और ग़ैर ज़िम्मेदाराना फ़ैसलों पर पर्दा डालने की लिए कभी 'सिस्टम ' पर तो कभी राज्य सरकारों पर दोषारोपण करने की कोशिश क्यों न करें परन्तु हक़ीक़त में अब भारतीय जनता पार्टी के ही अनेक मंत्री, सांसद, विधायक यहाँ तक कि लाइव डिबेट में भाजपा प्रवक्ता तक यह कहने लगे हैं कि कहीं न कहीं सरकार के कोरोना प्रबंधन में कमियां रही हैं। यहां तक कि 5 राज्यों में हुए चुनाव को लेकर भी भाजपा प्रवक्ता से लेकर उच्च न्यायलय तक सवाल खड़े कर रहे हैं। आज दुनिया के अनेक देश उस भारत के लोगों की दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं जो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विश्व की पांचवीं बड़ी ताक़त बनने का दावा कर रहा था। विश्वगुरु बनने के मुहाने पर जा बैठा था। आज उसी भारत उसकी केंद्रीय सत्ता,देश के नेतृत्व, उसकी नेतृत्व क्षमता, देश व सत्ताधीशों की प्राथमिकताओं में अंतर पर दुनिया आश्चर्यचकित होकर सवाल खड़े कर रही है। सवाल किया जा रहा है कि गत वर्ष शुरू हुए कोरोना संकट और उसके बाद भारत में कोरोना की पहली लहर में मची तबाही से आख़िर  सरकार ने क्या सबक़ लिया था ? बुरी तरह जनहानि होने के बाद ऑक्सीजन,बेड व अस्थाई हॉस्पिटल्स का प्रबंध करना और इन सबसे बड़ी ज़रूरतों को पूरा करने के बजाए सत्ता की पूरी ताक़त विधान सभा चुनावों में झोंक देना यहां तक कि स्वयं प्रधानमंत्री व गृह मंत्री का कोरोना संकट से निपटने के उपाय करने के बजाय चुनाव जीतने की जुगत में दिन रात लगे रहना निश्चित रूप से इस बात का प्रमाण है कि इनकी नज़रों में देश के नागरिकों की जान की हिफ़ाज़त की फ़िक्र करने से ज़्यादा ज़रूरी विधान सभा के चुनाव जीतना है। इसी आशय के लेख व संपादकीय आज दुनिया के अनेक प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं। जो लोग भारत की अंतर्राष्ट्रीय  छवि की चिंता में दुबले हुए जा रहे थे, आज विश्व मीडिया द्वारा भारत की पेश की जा रही वास्तविक तस्वीर को देख कर अपना मुंह आख़िर कहाँ छुपाते फिर रहे होंगे ?

सवाल यह है कि सत्ता के बेलगाम होने और जनहित के फ़ैसलों से अलग सत्ता के विस्तार, आत्ममुग्धता से भरपूर प्रोपेगण्डे, ध्रुवीकरण की राजनीति,पूंजीवादी व्यवस्था को बढ़ावा देने, उद्योगों, छोटे व मंझोले व्यवसायियों की दुर्दशा तथा किसानों व श्रमिकों की बदहाली तथा कमर तोड़ मंहगाई व ऐतिहासिक बेरोज़गारी दर जैसे बद से बदतर होते जा रहे हालात की ज़िम्मेदार क्या अकेले सत्ता प्रतिष्ठान की ही है ? क्या वजह है कि सत्ता इतनी निरंकुश हो गयी कि आज देश को ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं कि देश में लाखों लोग ऑक्सीजन के बिना तड़प रहे हैं ? रोज़ हज़ारों लोग ऑक्सीजन की उपलब्धता के बिना दम तोड़ रहे हैं ? शमशान में शवों के अंतिम संस्कार के लिए जगह कम पड़ गयी है तो नए प्लेटफ़ॉर्म शमशानों व पार्कों यहाँ तक कि कई जगह खेतों में बनाए जा रहे हैं ? हद है कि लाश को कन्धा देने वाला नहीं मिल रहा तो 5 हज़ार रूपये लेकर कन्धा दिया जा रहा है ? सरकार की ऐसी नाकामियों की लंबी सूची है। देश की अनेक अदालतें सरकार को फटकार लगा रही हैं। कोरोना संबंधी समाचारों पर स्वतः संज्ञान ले रही हैं।  निश्चित रूप से अनेक आक्षेप व आलोचना झेलने के बावजूद आज भी अदालतें लोकतंत्र के पहले स्तंभ होने का अपना दायित्व कोरोना के इस संकट काल में भी निभा रही हैं। क्योंकि न्यायपालिकाओं को ऐसा महसूस हो रहा है कि संकट की इस घड़ी में कार्यपालिका व विधायिका जैसे लोकतंत्र के दोनों ही स्तंभ लड़खड़ा रहें हैं लिहाज़ा यदि 'लोक ' की रक्षा करनी है तो 'तंत्र' पर लगाम रखनी ज़रूरी है। सर्वोच्च न्यायलय से लेकर विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों तक कहीं न कहीं लगभग रोज़ाना कोरोना संकट को लेकर कोई न कोई सुनवाई चल रही है।

परन्तु स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताने वाला मीडिया जिसका काम वास्तव में शेष तीनों स्तंभों यानी न्यायपालिका, कार्यपालिका तथा विधायिका पर पैनी नज़र रखना है उस स्तंभ की भूमिका आख़िर क्या है ? बिहार के विधान सभा चुनावों से लेकर 5 राज्यों में हुए ताज़ातरीन चुनावों तक कभी भी देश के 'सत्ता संरक्षित ' मीडिया ने यह कहना या सवाल करना मुनासिब नहीं समझा कि कोरोना के संकटकाल में जनता की जान बचाना ज़्यादा ज़रूरी है न कि सत्ता का 'ख़ूनी खेल' खेलना ? किसी 'ग़ुलाम मीडिया ' ने देश के सत्ताधीशों से नहीं पुछा कि मास्क लगाने और सोशल डिस्टेंसिंग का प्रवचन पिलाने वाले महारथी आख़िर ख़ुद बिना मास्क के जनसभाएं और रोड शो कैसे कर हैं ? और सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ाते हुए इतनी विशाल जनसभाएं कैसे कर रहे हैं ? निश्चित रूप से यदि इस तथाकथित चौथे स्तंभ ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई होती तो चुनाव आयोग को चुनाव की घोषणा करने से पूर्व कई  बार सोचना पड़ता और मद्रास उच्च न्यायलय को चुनाव आयोग के विरुद्ध ' फांसी पर लटकाने ' जैसी टिप्पणी शायद न करनी पड़ती। परन्तु 'ग़ुलाम मीडिया ' तो सत्ता के संरक्षण में उससे लाभान्वित होने के मक़सद से सत्ता के ही एजेंडे को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है। चौथे स्तंभ की ज़िम्मेदारी तो यह है कि वह सत्ता का गुणगान करने के बजाय अपना आलोचनात्मक रुख़ रखे ताकि शेष तीनों स्तंभों को नियंत्रित रखा जा सके ?

परन्तु अफ़सोस की बात है कि मीडिया की प्राथमिकता ''फ़तेह का फ़तवा', तीन तलाक़, कोरोना के लिये मरकज़ बना कोरोना जिहाद का केंद्र,  और कॉरोनकाल में हरिद्वार कुंभ में उमड़ा  'आस्था का सैलाब', हिन्दू मुस्लिम डिबेट, लव जिहाद व चीन ,पाकिस्तान जैसे टी आर पी बढ़ने वाले विषय ही रहे। जिस पाकिस्तान में भारत के वर्तमान कोरोना संकट को लेकर चिंता देखी जा रही है,जहाँ के मशहूर समाज सेवी संगठन अब्दुल सत्तार ईधी फ़ॉउंडेशन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर पूरे देश में कोरोना मरीज़ों की सेवा के लिए अपने डॉक्टर्स की टीम व दवाईयें आदि भेजने का प्रस्ताव किया वहां के कोरोना प्रभाव के लिए हमारे देश के ग़ुलाम मीडिया शीर्षक लगाता है कि ' अब पाकिस्तान मरेगा कोरोना की मौत ? क्या यही है लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की शिक्षा,संस्कार व भाषा ? आज सत्ता की ख़ुशामद में लगे इसी ग़ुलाम मीडिया ने सत्ता की गोद में बैठकर सत्ता को बेलगाम होने का खुला अवसर दिया है। और कोरोना के चलते देश व जनता की बदहाली का सत्ता व व्यवस्था से भी बड़ा ज़िम्मेदार 'ग़ुलाम मीडिया ' है।

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना