Menu

 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

Print Friendly and PDF

बहुजन मीडिया की जरूरत, आखिर क्यों ?

संजीव खुदशाह/ मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ। लेकिन मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहलाने के लिए उसका लोकतांत्रिक, विविधता पूर्ण, सोशल बैलेंस से लैस होना चाहिए। लेकिन भारतीय मीडिया किसी राजतंत्र की तरह सिर्फ सवर्णों द्वारा संचालित होती हैं।

इसीलिए मैं भारत की मुख्यधारा की मीडिया को लोकतंत्र का स्‍तंभ नहीं बल्कि सवर्णों का स्‍तंभ कहता हूं। जहां पर दलित बहुजनों के लिए कोई जगह नहीं है। मुख्यधारा की मीडिया के न्यूज़ रूम का मतलब होता है, सवर्ण केवल सवर्ण। जहां दलित बहुजनों की आवाज को दबाना, महिलाओं का मजाक उड़ाना, वंचित तबकों के नेताओं को बेइज्जत करना, गंडे-ताबीज, राशियां, धनवर्षा यंत्रों, सेक्‍स ताकत की दवाई, चमत्कारों का प्रचार करना होता है।

यही कारण है आम लोग मुख्यधारा की मीडिया को गोदी मीडिया, बिकाऊ मीडिया, मनुवादी मीडिया जैसे नामों से नमाजते हैं। इन्हीं माहौल के बरअक्‍स आम जनता का मीडिया जिसे बहुजन मीडिया कहते हैं, अपनी पहचान बनाता हुआ दिखता है। यह मीडिया प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में अपनी लगातार पकड़ बनाता जा रहा है। संसाधनों की कमी के बावजूद यह मीडिया अरबपति मुख्यधारा की मीडिया से टक्कर ले रहा हैं। यूट्यूब में देखे जाने वाले चैनलों की बात करें तो बहुजन मीडिया मुख्यधारा की मीडिया के यूट्यूब चैनलों को बहुत पीछे छोड़ रहा है।

(यहां पर बहुजन का मतलब किसी राजनैतिक पार्टी से नही बल्कि भारत का बहुसंख्‍यक दलित आदिवासी पिछड़ा धार्मिक अल्‍पसंख्‍यक से है।)

अब प्रश्न उठता है कि यदि मुख्यधारा की मीडिया है, तो बहुजन मीडिया की क्या जरूरत है? आइए समझने की कोशिश करते हैं।

1  मुख्यधारा का मीडिया बहुजनों की बात नहीं करता- 

यह सबसे महत्वपूर्ण तथ्‍य है कि मुख्यधारा का मीडिया बहुजनों की बात, उनके नायकों की बात नहीं करता, चुप्पी साध जाता है। हर वर्ष 14 अक्‍टूबर को दीक्षाभूमि नागपुर 14 अप्रैल को महू तथा 6 दिसंबर को चैत्‍य भूमि दादर, मुंबई में जुटने वाली लाखों की भीड़ को मुख्‍य धारा की मीडिया में जगह न देकर केवल सौ डेढ़ सौ लोगों के शस्‍त्र पूजन कार्यक्रम को महिमामंडित करने का उदाहरण हमारे पास है। बहुजनों के साथ होने वाले अत्याचार, समाचार की कोई जगह नहीं रहती। न ही बहुजन पत्रकार, लेखकों, बुद्धिजीवियों के लिए उसके पास कोई स्थान है

2  मुख्यधारा का मीडिया पक्षपात करता है- 

मुख्यधारा का मीडिया समाचार के प्रसारण में पक्षपात करता है। यदि अपराधी सवर्ण होते हैं तो उसकी पहचान छिपा दी जाती है। केवल दबंगों ने ऐसा किया कहा जाता है। वहीं यदि आरोपी बहुजन समाज से आता हो तो उसकी जाति सहित सारी पहचान उजागर कर दी जाती है। मानो अपराधी वह नहीं उसकी जाति‍ है।

3  मुख्यधारा का मीडिया झूठ फैलाता है-

तबलीगी जमात के बारे में खबर बताई गई कि वह करोना बम है। करोना फैला रहे हैं। वही कुंभ मेले के संबंध में कहा गया है कि लोग फंसे हुए है। इसी प्रकार सुशांत केस  से लेकर हाथरस कांड तक में हजारों उदाहरण है जहां सच को छि‍पा कर झूठ फैलाया गया।

4  मुख्यधारा का मीडिया नायक वाद का पक्षधर है-

मुख्यधारा का मीडिया असल पत्रकारिता के बजाय किसी को नायक किसी को खलनायक बनाने में लगा रहता है। इसलिए महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी के मुद्दे को छोड़कर पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, इजरायल पर समय खर्च करता है। इस बात को आप अन्ना हजारे बाबा रामदेव सुशांत केस से समझ सकते हैं। यह नायकवाद का पक्षधर होने के कारण हमेशा नायक पूजा में लगा रहता है और प्रश्न विपक्ष से पूछता है।

5  मुख्यधारा का मीडिया गैरजरूरी समाचार की भूख पैदा करता है-

यह मीडिया ऐसे समाचार लगातार प्रकाशित कर गैरजरूरी समाचार की भूख पैदा करता है। जिसका जन सरोकार से कोई लेना देना नहीं होता जैसे श्रीदेवी की मौत, तैमूर, सुशांत केस आदि पर लगातार महीनों न्यूज़ चलाया गया। मकसद था जरूरी खबर को दरकिनार कर देना।

6  मुख्यधारा की मीडिया ब्राह्मणवादी है-

मुख्यधारा की मीडिया को यदि कोई दलित आदिवासी एक्सपर्ट चाहिए तो भी वह किसी ब्राह्मणवादी व्यक्ति को चुनता है। उनका पूरा न्यूज़ रूम ब्राह्मणवादियों से भरा पड़ा रहता है। पक्ष , विपक्ष , एंकर सभी वे ही होते है। वे जात पात को लेकर नाक भौ सिकोड़ते हैं। आरक्षण, एट्रोसिटी, महिला अधिकारों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों के खिलाफ लेख रिपोर्टिंग प्रोग्राम पेश करते हैं। ब्राह्मणवादी व्‍यक्ति जातिवादी और अंधविश्वासी होता है। इसलिए वह अवैज्ञानिक, अंधविश्वास युक्‍त कार्यक्रम प्रसारित करते हैं। धन वर्षा यंत्र, राशिफल के कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। वंचित वर्ग के साथ होने वाले शोषण के समाचार ऐसे दिखाया जाता है जिससे शोषण कर्ता हीरो और पीडित विलेन लगता है। 

ये वे तमाम कारण है जो देश में बहुजन मीडिया की जरूरत पैदा करते है। अब प्रश्न उठता है कि बहुजन मीडिया किसके लिए, बहुजन समाज के लिए या मुख्यधारा की मीडिया को रिप्लेस (विस्‍थापित) करने के लिए।

बहुजन मीडिया के दो गंतव्य हैं पहला खुद बहुजन समाज, दूसरा है पूरा विश्व। बहुजन मीडिया अपनी पीड़ा, अपने दर्द, शोषण, तरक्‍की के अनुभव को अपने मीडिया के माध्यम से समाज में लाता है ताकि पीड़ितों की आवाज बन सके। राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षणिक विकास हो सके। दूसरा है मुख्यधारा की को मीडिया बहुजन मीडिया से विस्थापित कर दिया जाए।15% जनसंख्या सवर्णो द्वारा वर्तमान में मुख्यधारा की मीडिया संचालित किया जा रहा है।

इसलिए इस मीडिया में बहुजनों की एंट्री नहीं होती। न ही उनके समाचारों के लिए कोई जगह होती है। यही कारण है एससी एसटी ओबीसी अल्पसंख्यक पत्रकार मुख्यधारा की मीडिया में नहीं मिलते हैं। यदि इक्‍के दुक्‍के मिलते भी हैं तो वह सवर्णों की भाषा बोलने के लिए मजबूर हैं। इसलिए बहुजन मीडिया सबके लिए वैश्विक प्लेटफार्म पर मुख्यधारा की मीडिया के स्थान पर काम करने की बात की जाती है। ताकि जो शोषण हो रहा है, जो अत्याचार किया जा रहा है, वह विश्व के पटल तक जाए। न कि बहुजन समाज तक सीमित रहे।

आइए अब समझने की कोशिश करते हैं कि बहुजन मीडिया किस लिए काम करता है उसका मकसद क्या है?

1  अपनी बात रखने के लिए 

भारत के बहुसंख्यक समाज की आवाज बनने की कोशिश कभी भी मुख्यधारा की मीडिया ने नहीं की है। यह जो खाली जगह है इसे भरने के लिए बहुजन मीडिया बेहतरीन काम कर रहा है। आज जब इंटरनेट और तमाम संसाधन आम जनता के हाथ में आसानी से उपलब्ध है। इसलिए वह बहुजन मीडिया के माध्यम से अपनी बात को रख रहा है।

2 पक्षपात रोकने के लिए 

मुख्यधारा का मीडिया के पक्षपात पूर्ण रवैया से भारत की आम जनता परेशान है। समाचार के गलत प्रस्तुतीकरण से और उनके पत्रकारिता लोग समाचार देखना पढ़ना पसंद नहीं कर रहे हैं। इस पक्षपात को रोकने के लिए निष्पक्ष पत्रकारिता की जरूरत है। बहुजन मीडिया इस कमी को पूरा करने के लिए भरसक कोशिश कर रहा है और सफल हो रहा है।

3  सच दिखाने के लिए 

मुख्यधारा का मीडिया अपनी व्यक्तिगत फायदे को ध्यान में रखते हुए सच दिखाने से परहेज करता है। लेकिन बहुजन मीडिया जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है वहां आम जनता के बीच व्यवस्था के सच को सामने लाता है और समाचार का विश्लेषण करता है।  

4  नायकवाद के बजाए जनपक्ष इधर मीडिया तैयार करने के लिए 

बहुजन मीडिया नायकवाद पर काम नहीं करता है। वह एक जन पक्षधर मीडिया तैयार करता है। एक ऐसे पत्रकारों का समूह तैयार करता है जो कि जनता की बात को जनता तक पहुंचाने का काम करता है। प्रश्न विपक्ष के बजाय जिम्मेदार लोगों से पूछता है।

5  ब्राह्मणवादी मीडिया का पर्दाफाश करने के लिए 

बहुजन मीडिया का यह एक महत्वपूर्ण काम है वह ब्राह्मणवादी मीडिया या मुख्यधारा की मीडिया द्वारा फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का पर्दाफाश करता है और उनकी दूषित पत्रकारिता की कलाई खोलता है। आम जनता तक यह बात लेकर के जाता है कि किस प्रकार से जातिवादी और भेदभाव पूर्ण पत्रकारिता की जा रही है।

6  वैज्ञानिक विचारधारा के प्रचार प्रसार के लिए 

बहुजन मीडिया का यह प्रमुख उद्देश्य है कि वह अंधविश्वास मुक्त समाज बनाने के लिए प्रयास करें और वैज्ञानिक सम्मत कार्यक्रम तैयार करें, अंधविश्वास का पर्दाफाश करें। संविधान में इस बात का उल्लेख किया गया है कि अंधविश्वास मुक्त समाज का निर्माण करने में देश अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। आज भारत के सभी वर्गों में परंपरा के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, धर्म के नाम पर, अंधविश्वास समाया हुआ है। इस कारण हमारा देश पिछड़ा हुआ है। अंधविश्वास से मुक्ति के लिए मुख्यधारा का मीडिया कोई काम नहीं करता है। क्‍योकि वह पूजीवाद के साथ खड़ा है। इसीलिए बहुजन मीडिया की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह अंधविश्वास मुक्त समाज निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करें।

7 नए नरेटिव तैयार करने के लिए 

जिस प्रकार से मुख्यधारा का मीडिया कट्टरपंथियों और देश को बांटने वाले विचारधारा से ग्रसित होकर गलत नरेटिव तैयार करता है। जैसे मुसलमानों को देश का दुश्मन बताता है। दलितों पिछड़ो को हराम का खाने वाला बताता है। आरक्षित वर्ग को जलील करता है। उसी प्रकार बहुजन मीडिया नए नरेटिव तैयार करने की जरूरत है जैसे संविधान सबके लिए है और संविधान बराबरी का बात करता है वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करता है। ठीक इसी बहुजन मीडिया ने कई नैरेटिव तैयार किए और आम जनता तक सच को पहुंचाया गया। जैसे मनुस्मृति के बारे में, ब्राह्मणवाद के बारे में, मनुवाद के बारे में, जो नरेटिव तैयार किए गए उससे सच्चाई समझाने में आसानी हुई। इसीलिए  बहुजन मीडिया का यह कर्तव्य है कि वह नया नैरेटिव तैयार करें और उस पर काम करें। 

फॉरवर्ड प्रेस में प्रकाशित

Go Back

Comment

नवीनतम ---

View older posts »

पत्रिकाएँ--

175;250;cff38901a92ab320d4e4d127646582daa6fece06175;250;e3ef6eb4ddc24e5736d235ecbd68e454b88d5835175;250;25130fee77cc6a7d68ab2492a99ed430fdff47b0175;250;7e84be03d3977911d181e8b790a80e12e21ad58a175;250;c1ebe705c563d9355a96600af90f2e1cfdf6376b175;250;911552ca3470227404da93505e63ae3c95dd56dc175;250;752583747c426bd51be54809f98c69c3528f1038175;250;ed9c8dbad8ad7c9fe8d008636b633855ff50ea2c175;250;969799be449e2055f65c603896fb29f738656784175;250;1447481c47e48a70f350800c31fe70afa2064f36175;250;8f97282f7496d06983b1c3d7797207a8ccdd8b32175;250;3c7d93bd3e7e8cda784687a58432fadb638ea913175;250;7a01499da12456731dcb026f858719c5f5f76880175;250;0e451815591ddc160d4393274b2230309d15a30d175;250;ac66d262fc1ac411d7edd43c93329b0c4217e224175;250;ff955d24bb4dbc41f6dd219dff216082120fe5f0175;250;028e71a59fee3b0ded62867ae56ab899c41bd974175;250;460bb56d8cde4cb9ead2d6bff378ed71b08f245d

पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना