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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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नायकत्व की पगड़ी बाँधने में मीडिया हड़बड़ी न करे

राजनीति के व्याकरण और रंग-ढंग बदलने वाले नए नायक को दे सकते हैं तो दीजिये ये एक नाम.. राजनायक' कहिये!

नवेन्दु कुमार। एक टीवी चैनल पर देख रहा था ...अरविन्द केजरीवाल को 'जननायक' लिखा जा रहा था  मुझे तनिक खटकी ये बात... भावनाओं की बात है और इस बात से इनकार नहीं  अरविन्द में नायकत्व न सिर्फ ढूँढा जा रहा है, बल्कि नायकत्व की पगड़ी बाँधने की हड़बड़ी भी है -मीडिया हमेशा हड़बड़ी में रहता है, सो उधर से हड़बड़ी ज्यादा है । लेकिन इतनी सी अर्ज और सलाह कि हड़बड़ी में ऐसी गड़बड़ी न करें कि कई बड़ी विभूतियों का अपमान हो जाए और अरविन्द के हिस्से की पहचान का भी घोल-मट्ठा हो जाए 

'जननायक' इस देश में सामाजिक न्याय के पुरोधा और दबे-कुचलों की राजनीति के जरिये समाज बदलने वाले नेता स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर को कहा जाता है…और 'लोकनायक'कहते हैं जेपी को, आज़ाद हिंदुस्तान में तानाशाही के खिलाफ सम्पूर्ण क्रांति की मुनादी करने वाले नेता जयप्रकाश नारायण ...तो क्यों नहीं देना ही है तो अरविन्द केजरीवाल को एक नया नाम दिया जाए !

ये नया नाम और विशेषण हो सकता है 'राजनायक' का...चूंकि अरविन्द ने इस देश की राजनीति को एक नया आयाम दिया है...वे आगे क्या करेंगे, क्या नहीं, लेकिन अब तक जो वे करते रहे और चुनाव लड़ने, जीतने, सरकार बनाने तक जो कर रहे हैं वो दरअसल इस देश की राजनीति के तर्ज को बदल देने जैसा है...जैसे कोई राजनितिक क्रांति! केजरीवाल ने दिल्ली चुनावी परिणामों के बाद जंतर मंतर पर अपनी "धन्यवाद रैली" में खुद को ‘लिबरल सोशलिस्ट’ बताते हुए कहा भी था कि वे देश  में “राजनैतिक क्रांति" लाएंगे। चुनावी राजनीति ही सही, तो वे अब पूरे देश में चुनाव लड़ेंगें।... "I am a Liberal Socialist” !

ये भ्रम मुझे तो नहीं ही है कि ‘आप’ या अरविन्द कोई आम –अवाम या किसान-मजदूरों, दलित-पीड़ितों की मुक्ति के नायक बनने जा रहे हैं या बनेंगें, क्योंकि उनकी मॉस लाईन बिलकुल दीगर है...समानता की लडाई और सामंतवाद-पूँजीवाद के खिलाफ मुक्ति संग्राम जैसी सोच और शब्दावली वे कभी उच्चारित भी नहीं करते । भ्रष्टाचार उनका मेन एजेंडा है...सेवा क्षेत्र को वे जनहितकारी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से देखते है शायद बिजली-पानी पर जोर उसी का हिस्सा माना जाना चाहिए राजनीतिक पद्धति को निहायत ही लोकतान्त्रिक बनाना उनका शगल दीखता है ...ये काम और लक्ष्य कम से कम मौजूदा संसदीय राजनीति और राजनीतिज्ञों के रंग और ढंग बदल दे, तो भी बड़ी बात होगीl वर्ना आज संसदीय राजनीति में आम आदमी के लिए छल और फरेब के बचा ही क्या है? राजनीति बचेगी तभी कुछ और बच पायेगा 

आप के मंत्री मनीष सिसोदिया ने अपने दो दिनों के मंत्रालयी कामकाज और संस्कृति में भी उस राजनीति का ही अक्श देखा जिसने आम जनता का जीना हराम कर रखा है। मनीष ने हाल-ए-दास्ताँ कुछ यूँ सुनाई... “अभी तो नई राजनीति बनाम पुरानी राजनीति की परंपराओं में यह टकराव चलेगा।...अगर हम स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा, साफ पानी और साफ-सुथरे शौचालय भी मुहैया नहीं करा सकते तो शिक्षा विभाग की जरूरत ही क्या है?...अगर लोग गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हैं तो दिल्ली जल बोर्ड या फिर जल संसाधन मंत्रालय के अस्तित्व का क्या मतलब है?...अगर हम इस ठंड में खुले आसमान के नीचे सोने वाले के लिए छत, बीमार के लिए इलाज और हर व्यक्ति को पीने के लिए पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाते, तो विकास का नारा किसके कानों तक पहुंचा है ”।

वे आगे क्या करेंगे, क्या नहीं, लेकिन अब तक जो वे करते रहे और चुनाव लड़ने, जीतने, सरकार बनाने तक जो कर रहे हैं वो दरअसल इस देश की राजनीति के तर्ज को बदल देने जैसा है...जैसे कोई राजनीतिक क्रांति!

जनता कैसी राजनीति पसंद करती है?...खुद को जन प्रतिनिधि और उनका हमदर्द कहने वाले दलों और नेताओं से वह कैसे सरोकार की अपेक्षा करती है?...साथ ही गवर्नेंस के लिहाज से गवर्न करने वाले वाले के लिए ज़रूरी है कि वह श्रेष्ठ सेवक मानिंद लगे...तात्पर्य ये कि सेवा निमित शासन की नीति से लबरेज हो राजनीति...कोई लाव-लश्कर वाला मुखिया मंत्री नहीं, हमारे-आपके जैसा हमारा नेता  अलबता ये नेतागिरी ही चलन में रहे तो वैसे ही भ्रष्टाचार के कई कारक स्वतः समाप्त हो जायेंगे  भले ही क्रन्तिकारी वामपंथियों को ‘आप’और अरविन्द बुर्जुआ के नए लोकप्रियतावादी मुखौटा लगें, लेकिन राजनीति की चाल-ढाल और सलीका बदलने वाले किसी नायक को एक सीरे से ख़ारिज भी कैसे कर सकते हैं? इस फलसफे को कैसे दरकिनार कर सकते हैं की सत्ता संभालने का बाद भी कोई लूट और भ्रष्टाचार के सिस्टम के खिलाफ जनता के साथ संघर्ष करने  का शंखनाद करे! सत्ता का सवार सादगी का दामन न छोड़े!        

अगर लगता है आपको कि अरविन्द और ‘आप’ छलिया राजनीति के धुरंधरों को भी अपनी लोक राजनीति से मात दे रहे हैं...लगता है आपको कि वे देश में राजनीति का न सिर्फ नया व्याकरण गढ़ रहे हैं, बल्कि उस पर अमल भी कर रहे हैं...लगता है आपको कि राजनीति की शुचिता बचेगी तभी बच पायेगी किसी क्रन्तिकारी राजनीति की धार भी और जनता आपके साथ, आपके पास रहेगी, तभी कर पायेंगे आप कोई जन राजनीति भी...तो फिर बेहिचक कहिये और दीजिये उन्हें एक नया नाम – “राजनायक”!

(नवेन्दु कुमार जी के ब्लॉग Navendu ki Batein से साभार )

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सम्पादक

डॉ. लीना