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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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अप्रैल का कैलेंडर होगा निगाहो से परे !

यादवेन्द्र / पंजाब के एक प्रतिष्ठित अखबार ने खबर छापी है कि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ( एन सी बी ) द्वारा वितरित किये गए इस साल के कैलेंडर को लेकर महकमे में हडकंप मच गया जब हेरोइन की एक बड़ी खेप मोहाली में पकड़ी गयी और उसकी छानबीन में मुक्केबाजी में भारत के पोस्टर ब्वाय विजेन्द्र का नाम उछला। हरियाणा पुलिस में तैनात विजेन्द्र को पंजाब पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया और उनके असहयोग और जाँच के लिए बाल और खून के नमूने देने में आनाकानी करने की सुर्खियाँ भी खूब बनीं। एन सी बी की दुविधा है कि उनके कैलेंडर में अप्रैल के महीने के पन्ने पर विजेन्द्र के वक्तव्य के साथ उनकी तस्वीर छापी गयी है ...वक्तव्य भी यह कि "नशीले पदार्थों का सेवन हमारे समाज और देश के हितों के लिए गंभीर चुनौती है ...आप दो टूक कहें -- नहीं।" खबर छापने वाला अखबार महकमे के एक अधिकारी के हवाले से कहता है कि हम दफ्तर में अप्रैल माह में कैलेंडर को लोगों की निगाह के सामने से परे हटा देंगे। विजेन्द्र के कथित रूप से नशाखोरी के मामले में संलिप्त होने की बात अभी तो सिर्फ जाँच के दायरे में है, पर जिस बात का सेहरा उनके सिर बाँधा जा रहा है उसकी शंका की छाया पड़ना भी किसी महकमे के शर्मिंदा होने के लिए पर्याप्त है।

एक सेलिब्रिटी की फोटो को लेकर एक तरह की उहापोह एन सी बी के अन्दर है तो दूसरी तरफ एक निहायत मामूली , गरीब और गहरे सदमे का शिकार हुआ आदमी बरसों से इस बात की गुहार लगा रहा है कि मेरी बेचारगी का मजाक मत उडाओ और मुझे इस देश की करोड़ों की भीड़ का बेचेहरा हिस्सा बने रहने दो। पहली मार्च 2002 को गुजरात दंगों के दौरान खींची गयी हाथ जोड़ कर जिंदगी की भीख मांगती कुतुबुद्दीन अंसारी की देश और दुनिया में मशहूर हो चुकी फोटो अब अदालती फाइलों में उलझ गयी है -- रॉयटर के लिए काम करने वाले फोटोग्राफर अर्को दत्ता ने वह फोटो तब खींची थी जब दंगाइयों के आगजनी और ताण्डव के सामने( दिन में काले धुंए के इतने घने बादल थे कि गाड़ी की लाइट जलानी पड़ी थी) जीवन की आस छोड़ चुका दरजी कुतुबुद्दीन अपनी दूकान के सामने से गुजर रहे अर्द्धसैनिकों से जान बचा देने की गुज़ारिश कर रहा था। शरणार्थी कैम्पों में गुज़ारा  कर रहे हजारों पीड़ितों के बेचेहरा समूह में हफ्ते भर बाद कुतुबुद्दीन को किसी अखबार में छपा अपना चेहरा दिखाई पड़ा और तब से वह फोटो किसी पिशाच की तरह उसका पीछा कर रही है।उस फोटो ने उस से कामधंधा और घरबार छुडवा दिया। वह अहमदाबाद से भाग कर बहन के पास मालेगाँव (महाराष्ट्र) चला गया पर मुश्किल से पंद्रह दिन हुए कि नए काम से मालिक ने अखबार में उसकी फोटो देखकर निकाल दिया -- खामखा कौन इस लफड़े में पड़े। बंगाल की तत्कालीन सरकार ने उसको कोलकाता में शरण दी पर साल भर में ही बीमार माँ की देख भाल करने क लिए उसको लौटना पड़ा। बार बार पहचान लिए जाने के कारण उसको नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

इतना ही नहीं एक कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन ने अपनी वेबसाईट पर उसकी फोटो लगा दी और कुतुबुद्दीन सफ़ाइयाँ देते देते थक गया।पर अब वह तीन सयाने होते बच्चों का पिता है और बच्चों के इस सवाल का जवाब उसके पास बिलकुल नहीं है कि "अब्बू आप इस तस्वीर में हाथ किसको जोड़ रहे हो और इस तरह बेसब्री से रो क्यों रहे हो?"उसके बच्चों को स्कूल में अक्सर इस कटाक्ष का सामना करना पड़ता है कि उनके पिता की रोती गिड़गिडाती हुई फोटो सबने देखी है। एक इंटरव्यू में उसने कहा कि उस फोटो की वजह से मैं बेचेहरा नहीं रहा बल्कि मेरी पहचान वैसे जगजाहिर कर दी गयी जैसे अपराधियों की की जाती है --- मेरा कुसूर क्या है , यही कि मैंने अपनी जान बक्श देने के लिए हाथ जोड़ कर सामने वाले से दुआ की।

कुछ दिनों पहले रिलीज हुई फिल्म राजधानी एक्सप्रेस में कुतुबुद्दीन अंसारी की वाही फोटो बार बार दिखाई गयी है -- थाने  के अन्दर बोर्ड पर चिपकी हुई जिसकी ओर एक पुलिस अफसर बार बार पिस्तौल तानता  दिखाया जाता है।अदालत में दिये अपने बयान में अंसारी कहता है कि मेरे बच्चे बार बार मुझसे सवाल करते हैं कि आखिर मैंने कौन सा जुर्म किया था जिस से पुलिस अफसर मेरी और पिस्तौल तान रहा है ...मेरी गुजारिश है कि फिल्म से मेरी फोटो बिलकुल निकाल दी जाए क्योंकि मैं अपने बच्चों को यह समझाने में नाकामयाब रहा हूँ कि आखिर 2002 में क्या ख़ास बात हुई थी ...मैं उनको कैसे समझाऊँ कि फिल्म में मेरे ऊपर क्यों निशाना साधा जा रहा है।

आये दिन सेक्स हिंसा की शिकार भयभीत और अपनी पहचान छुपा लेने का भरसक प्रयत्न करती युवतियों की फोटो अखबारों में देखने को मिलती हैं,पर जुल्म ढ़ाने वाले अक्सर विजयी मुस्कान लिए पन्नों पर अवतरित होते हैं... पर फोटो की इस भूख को क्या कुतुबुद्दीन अंसारी जैसी मानवीय त्रासदी और नैतिकता की रोशनी में देखने का समय नहीं आ गया लगता है?

 

                                                                              

 


 

 

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सम्पादक

डॉ. लीना