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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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दलित आंंदोलन के विरोधियों को आजीवक चिंतकों का डर होना ही चाहिए!

अरुण आजीवक/ बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने कहा था 'समाज की प्रगति उस समाज के महिलाओं की प्रगति से मापना चाहिए।' इसी तर्ज पर यह भी कहा जा सकता है कि समाज की मजबूती उस समाज के साहित्य से भी तय होती है।

साहित्य का सीधा सम्बन्ध साहित्यकारों से होता है। दलित कौम में साहित्यकारों की आज कमी नहीं। पर ये क्या साहित्य लिख रहे हैं और उस साहित्य का दलित समाज से क्या सरोकार है? यह सब देख रहे हैं। पिछले महीनों वरिष्ठ दलित साहित्यकार आदरणीय सूरज पाल चौहान जी के पत्रों ने कथित दलित साहित्यकारों के कच्चे-चिट्ठे खोल कर रख ही दिए हैं। उन्हीं पत्रों से लोगों को मालूम हुआ कि कँवल भारती कितने शराबी, दुराचारी और न जाने क्या-क्या हैं। चौहान सर के पत्रों से इन का असली चरित्र खुल कर सामने आ गया है। बावजूद इस के ये अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे। अपने चरित्र को प्रदर्शित करते हुए पुनः इन्होंने एक नमूना प्रस्तुत किया है।

मैंने कल एक पोस्ट 'विरोधियों के मोहरे बनते अपढ़ दलित' डाली थी, जिसे मित्र लोकनाथ कुमार जी ने अपनी वाल पर शेयर किया है। लोकनाथ कुमार की वाल पर मेरी उक्त पोस्ट के बारे में कँवल भारती ने टिप्पणी किया है-

"यह भाषा कैलाश दहिया के सिवा कोई लिख ही नहीं सकता।"

साहित्यकार कहलाने वाले कँवल भारती की यह है बुद्धि। इस टिप्पणी से इन के मानसिक स्तर का अंदाजा लगाया जा सकता है। क्या कहा जाए! इसी तरह चौहान सर के एक पत्र के बारे में भी एक कथित दलित लेखक ने कहा था कि वह कैलाश दहिया का लिखा हुआ है। हद है!

पता चला है कि जब महान आजीवक चिंतक डा. धर्मवीर  जीवित थे तब कैलाश दहिया जी के लेखों को कँवल भारती डा. धर्मवीर का लिखा हुआ बताया करते थे। डा. साहब के न रहने पर अब ये हमारे लिखे को कैलाश दहिया जी का लिखा बता रहे हैं। तो दलित साहित्यकारों की अक्ल इस तरह की है!

इन की इस टिप्पणी को किस रूप में लिया जाए? लगता है इन के दिमाग में डा. धर्मवीर का जबरदस्त डर बैठ गया था जो दहिया जी के लेखों में भी इन्हें डा. साहब ही नजर आ रहे थे। डा. साहब के निधन के बाद आजीवक चिंतन के पक्ष में, जारकर्म के विरोध में दहिया जी लगातार लिख रहे हैं। लगता है इन के दिमाग में अब दहिया जी का डर समा गया है। यह अच्छी बात है। दलित आंंदोलन के विरोधियों को हमारे आजीवक चिंतकों का डर होना ही चाहिए। अभी तो गनीमत है। आगे डा. धर्मवीर के अनुयायियों की संख्या बढ़नी ही बढ़नी है। फिर तो इन जैसों को छुपने की भी जगह नहीं मिलेगी।

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सम्पादक

डॉ. लीना