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दलित साहित्य में अड़ंगे लगाते द्विज

कैलाश दहिया / द्विज आलोचक नंद किशोर नवल का एक साक्षात्कार हिन्दी पत्रिका ‘तहलका’ के 1-15, सितंबर, 2012 अंक में छपा है, जिसे इसकी वेबसाइट पर भी देखा जा सकता है। जैसा कि होता आया है, इन्होंने मुखौटा तो प्रगतिशील-उदारवादी का ओढ़ा हुआ है, लेकिन उस मुखौटे के नीचे एक सामंत छुपा बैठा है। ये सामंत साहित्यकार कविता में संवेदना की बात करते-करते महान दलित चिन्तकों बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर और डा. धर्मवीर के प्रति अपशब्द और अभद्र भाषा में बोलने लगते हैं।

इन्हें बताया जाए, जिस तरह साहित्य में द्विज आज दलित पुरोधा डा. धर्मवीर के कामों में अड़ंगे अटकाने में लगे हैं, उसी तरह राजनीति में बाबा साहेब अम्बेडकर के कामों में गांधी व अन्य राजनेता अड़ंगे लगाते रहे थे। कभी वे खुद को दलितों का हितैषी बताते तो कभी उनके प्रतिनिधि होने की गुहार लगाते हैं। ‘पूना पैक्ट’ इस अड़ंगेबाजी का चरम था। डा. अम्बेडकर को ‘कम्यूनल अवार्ड’ की बजाए गांधी की अड़ंगेबाजी से तंग आकर यह समझौता करना पड़ा।

इतना सब होने के बाद भी बाबा साहेब अम्बेडकर इतने उदार थे कि उन्होंने हिन्दुओं को सुधारना चाहा। इसके लिए वे संसद में ‘हिन्दू कोड बिल’ तक लेकर आए। लेकिन क्या हिन्दू भला सुधरते हैं? बाबा साहेब के ये प्रयास नवल जैसों को अड़ंगेबाजी लग रहे हैं। इधर, आज दलितों के सबसे बड़े चिन्तक डा. धर्मवीर द्विजों की अड़ंगेबाजी के एक-एक पैंतरे से वाकिफ हैं। वे साफ कह रहे हैं, हिन्दू अपनी व्यवस्था में रत रहें, हमें इनसे कोई मतलब नहीं। डा. धर्मवीर दलित मोरल साहित्य में द्विजों को झांकने देने की इजाजत तक नहीं दे रहे। इसी से नवल बौखला रहे हैं।
नवल जी को बताया जाए कि समाज और परिवार की तरह साहित्य में दो परम्पराएं हैं, ‘दलितों (आजीवकों) की मोरलिटी की परम्परा’ और ‘द्विजों की जार परम्परा।’ दलित परम्परा में विवाह सामाजिक समझौता है। यहाँ जारकर्म पर तलाक दे दिया जाता है। इससे दलितों में जारकर्म का नामोनिशान तक नहीं रहा। उधर, द्विजों के पवित्रा और अटूट ब्राह्म विवाह में ‘परकीया सम्बंध’ के नाम पर जार सम्बंधों की अबाध छूट रहती है। इससे जारकर्म इनकी संस्कृति का अटूट हिस्सा बना हुआ है।

‘पूना पैक्ट’ में दलितों को हिन्दू मान लेने से जारकर्म दलितों के जीवन में भी घुस आया जिसकी वजह से हमारे चिन्तक का घर तबाह हो गया। अब द्विज जार परम्परा का सच उघाड़ कर महान आजीवक चिन्तक डा. धर्मवीर मोरलिटी का साहित्य रचने में लगे हैं। नवल जी को डा. धर्मवीर की घरकथा ‘मेरी पत्नी और भेड़िया’ पढ़ लेनी चाहिए। उधर रमणिका गुप्ता लिखती हैं, ‘‘मुझे याद नहीं है अपने प्रेम करने वालों की संख्या। वह सब अपने में एक-एक अनुभव थे मेरे।’’ और प्रभा खेतान ने लिखा है, ‘‘विवाहेतर सम्बंध कभी स्थायी होते नहीं। ऐसे सम्बंध तो खत्म करने के लिए शुरू होते हैं।’’ बताइए, जो इस तरह के यौन अपराधों में संलिप्त हो और जिसकी ऐसी सोच हो, उसकी कथा-कविता कैसी होगी?, इसका इंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। वह यौन अपराध का साहित्य ही लिखेगा। प्रेमचंद भी और टैगोर भी ऐसे ही साहित्यकार थे। यही द्विजों की यौन-अपराध के साहित्य की परम्परा है जो वेद और पुराण से होती हुई आज प्रेमचंद और अन्य द्विज साहित्यकारों के रूप में हमारे सामने है। नवल जी इसी परम्परा के पैरोकार हैं। दलित मोरल साहित्य में इन जैसों के लिए रत्ती भर भी जगह नहीं। द्विज हैं कि दलित साहित्य लिखने की जिद पर अड़े हैं। ये दलित साहित्य के स्वाभाविक विकास में अड़ंगे लगाने में लगे हैं।
नवल जी ने ‘परकाया प्रवेश’ को लेखन कहा है। परकाया प्रवेश के नाम पर इन्हें बार-बार टालस्टाय की घोड़े पर लिखी कहानी याद आती है। हम तो तब मानेंगे जब वे घोड़े से उसकी व्यथा लिखवा लेंगे कि कैसे उसे दागा जाता है, कैसे भूखा रख कर दौड़ाया जाता है आदि-आदि। दलितों और खासकर दलित स्त्रिायों के साथ सदियों से जो अमानवीय बर्ताव किये जा रहे हैं, अब जब दलितों ने अपने दुख-दर्द लिखने शुरू कर दिए हैं तो नवल जैसों के पसीने छूट गए हैं। ये भी दलित-साहित्य लिखने की जिद कर रहे हैं। लिखें, लेकिन लिखने से पहले ये मरी गाय का मांस उतारें और दूसरों के पाखाने ढोएं-साफ करें। तब शायद कुछ समझ आए। दलितों के साथ तो ऐसे बर्ताव हजारों सालों से किए जा रहे हैं। फिर द्विजों का तो यह हाल है कि मंगल पर गए नहीं पर जिद मंगल पर लिखने की करते हैं। दलित कभी इनके मंदिरों की काम-कला और कर्मकांड पर लिखने की जिद नहीं करते, क्योंकि दलितों का इनके मंदिरों से कोई वास्ता तक नहीं। उधर प्रेमचंद ने दलित जीवन को जाने बगैर दलितों पर कलम चलाई। इससे कथनी-करनी का अंतर आना ही था। नवल जी अपने हलवाहे पर तो लिख सकते हैं, लेकिन सची-मुची हलवाहा बन कर लिखें तो लेखन का पता चल जाएगा। अगर वे परकाया प्रवेश की जगह ‘परकीया सम्बंध’ लिख देते तो बात ज्यादा समझ में आती।

उधर, टैगोर में इतनी ईमानदारी तो थी कि उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने दलित की चैखट नहीं देखी, इसलिए वे उनके जीवन पर नहीं लिख सके। इधर, प्रेमचंद की कथनी-करनी के अंतर पर डा. धर्मवीर की प्रेमचंद पर लिखी ‘प्रेमचंद: सामंत का मुंशी’ और ‘प्रेमचंद की नीली आँखें’ इसकी गवाह हैं। नवल इन किताबों पर बौखलाए हुए हैं। वे डा. धर्मवीर के प्रति अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। होता क्या है, जब विरोधी के तरकश के सारे तीर खत्म हो जाते हैं, तब वह गाली-गलौज पर उतर जाता है। नवल जी यही कर रहे हैं।

फिर ये दलित विमर्श को आयातित भी कह रहे हैं। कल को ये दलितों को ही विदेशी ठहरा देंगे, जबकि सारी दुनिया इन तथाकथित आर्यों की हकीकत जानती है। ये अपनी जड़ें ढूंढ़ें। दूसरों के घरों में तांक-झांक ना करें। ये बताएं, शम्बूक और एकलव्य के संघर्ष किस देश से आयातित हैं? हम अपनी परम्परा को जानते हैं। इन्होंने नीग्रो साहित्य तो पढ़ लिया लेकिन ये यहां के दलित साहित्य से बेखबर हैं। इससे बड़ी मजाक क्या होगी कि ये दलितों को अम्बेडकर को पढ़ने की सलाह दे रहे हैं, जबकि हर दलित खुद ही अम्बेडकर है। बाबा साहेब की तरह प्रत्येक दलित के साथ द्विजों द्वारा छुआछूत ही तो बरती जाती है। ऐसे में कोई भी दलित अपने आप अम्बेडकर बन जाता है। आज अम्बेडकर और धर्मवीर के अथक प्रयासों से दलितों के जीवन में मुस्कान आ गई है। यही नवल जी को सहन नहीं हो रहा। दलित की मुस्कान से ‘मनु-स्मृति’ में अपने आप ही आग लग जाती है।

जहाँ तक वर्ण-व्यवस्था की बात है, तो डा. धर्मवीर ने सही तो लिखा है किµ‘‘दलित हिन्दू वर्ण-व्यवस्था का कुछ नहीं लगता। वर्ण-व्यवस्था दलित की न माँ है, न ताई, न चाची, न मौसी और न मामी, न फूफी। वह उस की दादी या नानी में से कुछ नहीं। दलित के लिए हिन्दू वर्ण-व्यवस्था एक पराई और फालतू चीज है। ज्यादा से ज्यादा हिन्दू वर्ण-व्यवस्था दलित के लिए एक अचम्भा हो सकती है। जरूरत पड़े तो हिन्दू वर्ण-व्यवस्था दलित के लिए युद्ध है जो यह मुसलमान और ईसाई समेत किसी के लिए भी सिद्ध हो सकती है। हाँ, यह कहना, किसी भी दलित का मूल अधिकार है कि वह हिन्दू वर्ण-व्यवस्था का अंग नहीं है।’’ (देखें, दलित चिन्तन का विकास: अभिशप्त चिन्तन से इतिहास चिन्तन की ओर, डा. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, प्रथम संस्करण 2008, पृ. 17)
नन्द किशोर नवल इस बात से क्यों परेशान हो रहे हैं? इन्हें वर्ण-व्यवस्था प्रिय और अच्छी लगती है, वे इसे अपने लिए सुचारु रूप से चलाए रख सकते हैं। इसका एक रास्ता है, ब्राह्मण चार बच्चे पैदा करें, उन में से एक को ब्राह्मण, दूसरे को क्षत्रिय और तीसरे को वैश्य बनाए तथा चैथे को शूद्र कह कर जितना चाहे पीटा करेµदलित इस में क्या कर सकता है?, सचमुच, वर्ण-व्यवस्था दलित (आजीवकों) के लिए पराई और अचंभे की वस्तु है। तो, ये इधर-उधर की कहने की बजाए थोड़ा पढ़-लिख लें और डा. धर्मवीर के सवालों का जवाब दें। नवल जी ने निश्चित रूप से अम्बेडकर को नहीं पढ़ा। आज ‘धर्मवीर दृष्टि’ से द्विज साहित्य खारिज हो चुका है।

फिर, ये जानते-बूझते बातें छुपाना चाहते हैं। इन्हें बताया जाए कि नामवर सिंह को प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष पद से इसलिए हटाया गया है, क्योंकि वे आरक्षण विरोध का राग अलाप रहे थे। डा. धर्मवीर द्वारा नामवर सिंह के प्रिय शिष्य तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ की समीक्षा से वे बौखला गए थे। उनके भीतर का सामंत बाहर आ गया था और इस सामंत ने बाहर निकलते ही ‘आरक्षण’ को कोसना शुरू कर दिया था। ऐसे ही नवल जी के भीतर बसा सामंत बार-बार फुफकार रहा है। वे खुद को वाम विचारधारा का कहते कहते माक्र्स को नकारने लगते हैं। असल में यही भारतीय सामंतों का असली चेहरा है, जो कल तक माक्र्सवाद, प्रगतिशील और उदारवाद के मुखौटे के नीचे छुपा था। यही डा. अम्बेडकर की रिडल (पहेली) है। डा. धर्मवीर ने सही ही इन्हें ‘दलितों के रास्ते का बटमार’ कहा है। आज के बटमार ‘संवेदना’ की बात कह कर अपना चेहरा छुपाने में लगे हैं। इनसे पूछा जाए, ये कौन सी संवेदना का दम भर रहे हैं? क्या इन्होंने डा. धर्मवीर की कविता की किताबें ‘कम्पिला’ तथा ‘हीरामन’ पढ़ लीं? दलितों को अमानवीय स्थितियों में धकेल कर ये कौन सी संवेदना की बात कर रहे हैं! ऐसे ही लोगों के लिए भेड़ की खाल में भेड़िया जैसे जुमले का प्रयोग किया जाता है। इनके लिए ‘कविता संवेदना की चीज है’, दलित नहीं। ये मौका मिलते ही दलित की गर्दन काटने को तैयार बैठे हैं।

बाबा साहेब डा. अम्बेडकर सारी जिन्दगी दलित-उत्थान में लगे रहे और गांधी उनकी राह में अड़ंगे अटकाते रहे थे। आज डा. धर्मवीर दलितों की गुलामी मिटाने को प्रतिबद्ध हैं और नवल जैसे हिन्दू उनकी राह में अड़ेंगे अटकाने में लगे हैं। दलितों की नजर इन अड़ंगेबाजों की एक-एक गतिविधि पर है। नवल जैसों के लिए अच्छा होगा कि वे अपने साहित्य पर ध्यान दें। दलित अपना साहित्य खुद रच ही रहे हैं।( 'प्रभात वार्ता, कोलकाता ' से साभार)

 कैलाश दहिया  
संपर्क.मकान नं. 460/3
 पश्चिम पुरी, नई दिल्ली-63
Kailash Dahiya <kailash.dahiya@yahoo.com

      


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डॉ. लीना