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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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सही या गलत, मीडिया पहले जैसी ही है

नरेंद्र नाथ। जरा आप इस लिस्ट को देखें- सीडब्ल्यूजी: टाइम्स ऑफ इंडिया, टाइम्स नाउ की अगुवाई में एक्सपोज

कोलगेट: टाइम्स ऑफ इंडिया की अगुवाई में एक्सपोज

टूजी: पायनियर की अगुवाई में एक्सपोज

सीबीआई से रिपोर्ट बदलाने के लिए दबाव बनाने का मामला: इंडियन एक्सप्रेस। जिसके बाद यूपीए में कानून मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा

आदर्श घोटाला: टाइम्स ऑफ इंडिया की अगुवाई में एक्सपोज

-200 घंटे लगातार रेकॉर्ड लाइव टेलिकास्ट अन्ना मूवमेंट का। इस आंदोलन-कवरेज ने यूपीए सरकार की जड़ें हिला दी

– 250 घंटे लगातार निर्भया गैंगरेप का लाइव टेलिकास्ट। इसका असर मनमोहन सरकार पर क्या पड़ यह आपको पता है।

– 200 से ऊपर नरेंद्र मोदी की स्पीच का बिना किसी कट के लाइव टेलीकास्ट। जिसके बाद उनकी पॉप्युलैरिटी पूरे देश में फैलती गई।

– जंतर-मंतर को ही देश मान लिया गया पूरे देश की दूसरी समस्या को छोड़कर यहीं होनी वाली घटना भर को देश की समस्या मान लिया।

ये सारी मिसाल यूपीए काल में मीडिया कवरेज की हैं। उदाहरण और भी हैं। मांगने पर मिल जाएंगे। मतलब कोई सरकार हो, उसे मीडिया से कोई सपॉर्ट सिस्टम नहीं मिला करता था। मतलब मीडिया का एक अपना चरित्र और कंटेट था जो तब और अब एक जैसा ही है। एकाध अपवाद हो सकते हैं लेकिन इन-जनरल कमोबेश हालात एक जैसे रहे हैं।

अब बात मुद्दे की। इन दिनों एक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है मीडिया मोदी जी और उनकी टीम की हर बात की बुराई करती है और यह तो सोनिया-कांग्रेस की दलाल रही है। ऐंटी हिंदू है। असल में राजनीति में विक्टिम कार्ड बनना भी मास्टर स्ट्रोक माना जाता रहा है। ऐसे माहौल बनाने की कोशिश की है जिससे आप इस बात को मान लें कि हर सवाल पूछने वाला गलत है। फरेबी है। विदेश की शह पर साजिश में शामिल है। ऐंटी इंडियन है। आईएस का सपॉर्टर है। Presstitute (प्रेस्टीट्यूट) है। सिर्फ एक धारा सही है। एक तर्क सही है। इस अविश्वास के माहौल में आपको मंदिर के घंटे की तरह वही धुन सुनाई देगी जो आप सुनना चाहेंगे। समझना चाहेंगे। तर्क, फैक्ट जाएंगे तेल लेने।

जहां तक मीडिया का सवाल है, इसमें गंभीर खामियां पहले भी थीं, आज भी हैं। सत्ता बदलने से इसका चरित्र नहीं बदला है। हां, 26 मई 2014 से पहले इसी मीडिया की कहानी कई लोगों को सूट करती थी तो उस समय वे शिकायत नहीं करते थे। इसी मीडिया ने मुंबई लोकल ब्लास्ट के कवरेज को 24 घंटे में निबटाकर प्रिंस को हीरो बनाया था। राखी सावंत को मीडिया के प्राइम टाइम का चेहरा बना दिया था। कुंजीलाल के मरने की भविष्श्वाणी हो या सोहन सरकार के सपने में सोना मिलने की भविष्यवाणी, मीडिया ने इसे हेडलाइन बनाकर देश में किसानों की आत्महत्या हो या दूसरे असल-गंभीर मुद्दे, उसे इग्नोर किया।

तब इसी मीडिया के कुछ सीनियर राष्ट्रवादी पत्रकार ने एक लेडी टीचर पर फर्जी स्टिंग किया कि वह गलत काम करती है जिसके बाद दंगा भड़का। बाद में पता चला कि जानबूझकर टीआरपी के लिए ऐसा किया गया। आज कई राष्ट्रवादी लोग उनकी मिसाल देकर हम जैसों को उनसे सीखने की भी सलाह भी दी जाती है। केजरीवाल हो या कांग्रेस, हर किसी को मीडिया से शिकायत है।

मतलब गलत प्राथमिकता या सिलेक्टिव रिपोर्टिंग का ट्रेंड कोई नया नहीं है। लेकिन आज मीडिया का चरित्र और व्यवहार कुछ लोगों को उनके विचारों से सूट नहीं करता है तो आ गए उपदेश देने। 24 घंटे गाली देने का नॉनस्टॉप ट्रेंड जारी रहता है। मीडिया ही नहीं, हम जैसे पत्रकारों को व्यक्तिगत स्तर तक गाली-गलौज करते रहते हैं।

हां, मीडिया गलत है। मैं स्वीकार करता हूं। लेकिन गलती 26 मई 2014 से ही नहीं शुरू हुई। असली बात यह है कि किसी को परफेक्ट और बैलेंस्ड मीडिया नहीं चाहिए बल्कि उसे ‘अपना वाला मीडिया’ चाहिए जो उसके ट्यून पर बोले।

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सम्पादक

डॉ. लीना