विनीत कुमार / आज दि इंडियन एक्सप्रेस ने मुख्य पृष्ठ पर वरिष्ठ पत्रकार कोमी कपूर का संस्मरण प्रकाशित किया है. आज से 50 साल पहले जो आपाकाल लागू किया है, तब क्या स्थिति रही ? कपूर ने इसी आपातकाल पर “Emergency” शीर्षक से पूरी किताब भी लिखी है जिसे लेकर पिछले दिनों बनी फ़िल्म में ठीक से क्रेडिट न दिए जाने को लेकर विवाद भी हुआ. मीडिया के छात्रों के लिए यह एक ज़रूरी किताब है.
इतिहास या किसी भी दूसरे अनुशासन के अध्येता के लिए आपातकाल केवल वही नहीं है जिसकी चर्चा आज से पचास साल पहले बहुमत की सत्ता द्वारा लागू किया गया. मीडिया अध्येताओं के लिए इससे कहीं गहरे और सामयिक अर्थ भी शामिल हैं जो कि हर दौर में बनते-बदलते और परखे जाते रहेंगे.
पिछले कुछ वर्षों से आपातकाल को लोकतंत्र के भीतर एक राजनीतिक घटना के तौर पर ही नहीं, मुहावरे के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाने लगा है. दिलचस्प बात ये है कि इस मामले में कारोबारी मीडिया के साथ-साथ दूरदर्शन भी शामिल रहा. कई बार तो इसने अपने प्राइम टाइम कार्यक्रम में आपातकाल शब्द का ऐसा इस्तेमाल किया कि जैसे यूट्यबर पुरानी थम्बनेल को ही सहायक क्रिया और कारक बदलकर बार-बार चिपका दिया करते हैं. यह प्रचलन इतना बढ़ा कि अब सबके पास आपातकाल साबित करने और तय करने के पैमाने हैं.
मीडिया छात्रों के लिए आपातकाल के मायने यहीं से बदलते हैं. एक तरफ बहुमत की सत्ता की ओर से आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसे पब्लिक ब्रॉडकास्टर का बेजा इस्तेमाल किया गया तो दूसरी तरफ अख़बार के दफ़्तर के बिजली के तार काटे गए कि अख़बार ही न छपे..और इन सबके बीच पत्रकारिता के मानक निर्धारित होते चले गए. कुछ घोषित, कुछ अघोषित और कुछ व्यावहारिक समझदारी के साथ अपनाए जानेवाले भी.
कोमी कपूर का एक्सप्रेस में छपे संस्मरण मे, पहली पंक्ति में उनके संपादक कुलदीप नैयर आते हैं. वो क्या कहा करते, क्या सलाह देते…यहां से बात शुरु होती है. आप आगे इस संस्मरण से गुज़रते जाएंगे, आप रेखांकित करते जाएंगे कि तब पत्रकारिता के क्या मानक और मापदण्ड निर्धारित होते गए. गोयनका समूह कारोबार करते हुए भी रामनाथ गोयनका के नाम पर ऐसा पुरस्कार खड़ा किया कि किसी पत्रकार को मिलने का मतलब है कि वो अपने पेशे में बेहद ईमानदार, चुस्त और परफेक्ट है.
जाहिर तौर पर आपातकाल, भारतीय लोकतंत्र पर एक दाग़ है जिसे वक़्त के साथ भुला दिए जाने के बजाय अलग-अलग राजनीतिक कारणों से और गहरा किया जाने लगा है. बहुत संभव है कि कल को एशियन पेंट्स के विज्ञापन में यह शब्द शामिल हो. सामयिकता के आईने में इसे रखकर देखने का आग्रह और पत्रकारों में उत्साह शायद न बने लेकिन यदि वो राजनीतिक आग्रह से अलग ख़ुद को और अपने पेशे को रखकर आकलन करें तो बहुत कुछ ऐसा वो देख रहे हैं, कर रहे हैं, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनमें या तो शामिल हैं या फिर ख़ामोश जो आपातकाल के दौर में तय मानकों से विपरीत है.
ये अजीब बात हो सकती है लेकिन सच है कि उस दौर के पत्रकार इस घटना को उत्सवधर्मी अंदाज़ में याद करते हैं जबकि लोकतंत्र पर यह गहरा चोट रहा. उस दौर के पत्रकारों के लिए इसलिए उत्सवधर्मिता है क्योंकि इसक बिना पर अपने काम को, साहस को और पेशे को सेलेब्रेट कर सकते हैं, करने की स्थिति में हैं.
मैं किसी भी ऐसी घटना को मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल करने के पक्ष में नहीं हूं. हां, ये ज़रूर है कि तय मानक को याद करना और दिलाना ज़रूरी लगता है. ऐसे में जो मीडियाकर्मी हैं, वो ख़ुद से सवाल करें कि हम अपने पेशे के साथ क्या कर रहे हैं, क्या किया है और हमारे दौर में आपातकाल की स्थिति होती या हम आपातकाल की स्थिति में होते तो ठीक उसी तरह, उत्साह से अपने काम को याद कर पाते जैसे आज कोमी कपूर सहित उस दौर के बाक़ी मीडियाकर्मी याद कर रहे हैं ? कोई और न भी सही तो उन्हीं गोयनका के नाम पर पुरस्कृत मीडियाकर्मी जिन्होंने बहुमत की सत्ता से सीधी टक्कर ली और बताया कि हम आपके नहीं, अपने पाठकों के प्रति जवाबदेह हैं.
(तस्वीर विनीत कुमार जी के ही फेसबुक पोस्ट से साभार )

