अखिलेश कुमार/ आमलोगों के बीच हकीकत बयां करने का माध्यम पहले समाचारपत्र तथा रेडियो और बाद के दिनों में टेलीविजन रहा है। जबकि हाल के वर्षों में सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ा और अभिव्यक्ति की आजादी के साथ सुचनाओं के आदान-प्रदान का एक सशक्त माध्यम भी साबित हुआ है।
लेकिन जिस तरह से मिडिया के बड़े बड़े प्लेटफार्म के उपर सरकारों का 'प्रभाव' बढ़ते जा रहा है उससे तो यही लगता है कि सत्ता की नाकामियां तथा उसके एजेंडा के विरोध की खबरें अब दबकर हीं रह जाएगी! प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर विज्ञापन देने के आड़ में दबाव का सफ़ल एजेंडा तो पहले से हीं चल रहा है, अब बिहार सरकार ने सोशल मीडिया पर भी अपनी दबाव बनाए रखने का नया नुस्खा निकल लिया है। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा 8 अप्रैल 2025 को लिए गए निर्णय के अनुसार सोशल मीडिया और आन-लाइन मीडिया के 657 ऐसे बिहार में सक्रिय फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब तथा एक्स (टियूटर) को चयनित किया गया है जिनके फ्लॉवर्स अधिक हैं। अब उन्हें सरकार से विज्ञापन के नाम पर मिलने वाले पैसे के लालच में निष्पक्ष बातें रखना आसान नहीं होगा, क्योंकि स्वाभाविक रूप से विज्ञापन रुकने का भय बना रहेगा। इसलिए अब सरकार के किसी खामियों को उजागर करने तथा उसके नाकामियों को आम लोगों तक पहुंचना कठिन कार्य हो जाएगा जो चिंता का और चिंतन का विषय है।

