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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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पत्रकारिता की मातृभूमि, बस्तर में तबदील होती जाती दिल्ली और पिंजरे में बंद लोकतंत्र की शुक-सारिकाएं

त्रिभुवन / पत्रकारिता दरअसल पत्रकारों के लिए पेशा या प्रफेशन भर नहीं है। वह उनकी/ हमारी मातृभूमि है। पत्रकारिता के शिक्षा केंद्रों और शिक्षकों की कोई उपयोगिता या ज़रूरत नहीं है, अगर वे एक बेहतरीन लोकतांत्रिक समाज को मज़बूत बनाने वाली पत्रकारिता के लिए नए लोगों को तैयार नहीं करें।

हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय ने पहली बार तीन साल का स्नातक कोर्स शुरू किया है। इसका उद्घाटन शनिवार को पत्रकार रवीशकुमार ने किया। इस मौके पर उनका संबोधन विचारोत्तेजक था। संतुलित भी। और ऐसा भी कि सुनकर उस पर एक अच्छी बहस की जा सके। आप पत्रकारिता, साहित्य, कला, राजनीति आदि से न भी जुड़े हों तो भी एक सचेतन नागरिकता बोध के लिए उनके संबोधन में काफी कुछ था।

ज़रूरी नहीं कि रवीशकुमार के कुछ निष्कर्षों (जैसे अकर्मण्य विपक्ष या ब्रेकिंग/इक्स्क्लुसिव को लेकर उन्होंने जो कहा। रवीशकुमार ने प्रतिपक्ष को लेकर कहा था, "भारत में विपक्ष को ख़त्म कर दिया गया। एक नैरेटिव गढ़ दिया गया कि विपक्ष नाकारा है। विकल्प के लायक नहीं है, जबकि इसी मीडिया ने उसी विपक्ष से विकल्प ढूंढ़ा। और उसके लिए खुद भी अपने आपको उस प्रोपेगंडा के जाल में उलझा लिया। शिकार हो गया। अब वही मीडिया जाकर कह रहा है कि विपक्ष नाकारा है। इसमें विकल्प नहीं है। वह यह नहीं कह रहा है कि जो सत्ता के नीतिगत दुर्गुणों से लोकतंत्र किस तरह ध्वस्त हो रहा है। लेकिन वह याद दिलाता है कि विपक्ष में विकल्प नहीं है। ये जो प्रोसेस है, आपको वही समझना है।") से हम सहमत हों; लेकिन मातृभूमि के नए नागरिकों के लिए उनका संबोधन संजीदा और ऊष्मा से परिपूर्ण था। रवीशकुमार अक्सर दर्शकों को टीवी न देखने की एक विचित्र बात कहते रहते हैं: लेकिन इस संबोधन में उन्होंने साफ़-साफ़ जो कहा, उसका तात्पर्य यह था कि संघर्ष के बावजूद सपनों और संभावनाओं के द्वीप अभी अक्षुण्ण हैं।

हम उस कालखंड में जी रहे हैं, जब मीडिया के गपशप वाले कॉलम से लेकर गंभीर ख़बरों वाली जगहों तक नाना प्रकार के सम्मोहक झूठों की चिपें लगी रहती हैं। बहुत बार तो हमारे अति प्रखर बुद्धिमान मित्रों से आने वाले फॉरवर्डिड वाट्सऐप मैसेज भी अपने मूल स्रोत से चिप लगाकर ही प्रेषित किए जाते हैं और वे मुद्रा की तरह इस मोबाइल से उस मोबाइल तक पेटीऐम-नुमा यात्रा करते रहते हैं। ऐसे मौक़ों पर मुझे बार-बार अपने मित्रों से कहना होता है कि वे भले किसी भी प्रोफेशन में या किसी भी पद पर ही क्यों न हों, आपको पत्रकारिता की बुनियादी कसौटियों का बोध अवश्य होना चाहिए। ये हैं पांच डबॅलयू और एक ऐच यानी क्या, कब, कहाँ, कैसे, कौन और क्यों? इसके बिना आप ख़बरों और वाट्सऐप मैसेजेज की जालसाज़ियों को नहीं समझ पाते। हालाँकि अब यह सब उस स्तर पर किया जाता है कि इसे बिना बेहतरीन बुद्धिमत्ता के आसानी से नहीं समझा जा सकता।

भले पत्रकारों में यह धारणा बढ़ती जा रही हो कि पत्रकारिता में नौकरियां नहीं रह गई हैं, लेकिन मुझे लगता है कि पत्रकारिता का मूल्यबोध अब बाकी सब जगह भी ज़रूरी हो गया है।

मैं समझता हूँ कि जिस तरह कंप्यूटर की जानकारी के बिना आज किसी भी क्षेत्र में अस्तित्व बनाए रखना संभव नहीं, उसी तरह पत्रकारिता की शिक्षा भी एक सजग नागरिक के लिए आवश्यक हो गई है।

यह एक नया लोक है, जिसकी शिक्षा के बिना कोई भी चालाक सत्ताधीश या कॉरपोरेट कूट-कपट से बुद्धि का हरण कर लेगा और विवेक को निष्क्रिय कर देगा। वह आपको इस तरह छल लेगा कि आप 'राम तेरी गंगा मैली' की मंदाकिनी हो जाएंगे। और आए दिन ट्वीट करते मिलेंगे या फेसबुक पर उनकी ट्रॉल आर्मी के सदस्य हो जाएंगे! और मंदाकिनी की तरह गर्व से गाएंगे : 'तेरे ही हाथों लिखी शायद तबाही मेरी, दिल तुझपे वारा है, जान तुझपे वारूंगी....आए के न आए, रस्ता तेरा निहारूंगी' और तो और 'ओ मुझे तबाह करने वाले, तू मुझे कुबूल कर ले तो तेरा पुन्न होगा!' मंदाकिनी की इस मानसिक अवस्था को सिने लोक में प्रेम कहा जाता है और सियासी संसार में भक्ति!

ऐसे लोग सत्तापक्ष के तो हैं ही, उस प्रतिपक्ष के भी कम नहीं हैं, जिनसे बर्बाद होने का मज़ा वे चखते रहे हैं।

लेकिन यहीं पत्रकारिता की मातृभूमि ज़रूरी है, जो आपको एक सजग और बेहतरीन लोकतंत्र की ज़रूरत का बोध कराती है। आप जिस दस डिग्री के लोकतंत्र को लेकर झूमते फिर रहे हैं, वह कोई लोकतंत्र-वोकतंत्र नहीं है। अभी उसकी 350 डिग्री बाकी है और वह तभी मिल पाएगी जब आप सचेतन, सजग और सुविवेकी नागरिकता बोध से लबालब भर जाएंगे। अगर आप अर्बन नक्सल, खालिस्तानी, पाकिस्तानी, देशद्रोही और जाने कैसे-कैसे संबोधनों और चेतावनियों को अनसुना करके अपने संघर्ष की लौ को लपट बनाते रहेंगे। हर सत्ता अपने प्रतिरोध को इसी तरह खारिज करने की कोशिश करती है।

रवीशकुमार ने जिस समय ज़रूरत बताई कि यह विवि एक आर्काइव विकसित करे तो मेरे मानस पटल पर किसी बड़े अख़बार, कॉलेज या विवि की लाइब्रेरी नहीं, बुजुर्ग-सजग और सुविज्ञ पत्रकार सीताराम झालानी का चेहरा उभर आया। वे संभवत: 85 साल के होंगे और अपनी 20 साल की उम्र से तरह-तरह के विषयों पर ख़बरों का एक बड़ा आर्काइव तैयार करने लगे। उन्होंने बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से बिना किसी सरकार, अख़बार या समाजिक संस्था के आर्थिक सहयोग से इसे तैयार कर रखा है। उनके सामने बड़े-बड़े विवि और अख़बारों के वाचनालय फीके हैं।

झालानी स्वयं इतने विनयशील और सहयोगी हैं कि कोई भी पत्रकार उनसे आधी रात को कोई सूचना ले ले, वे इन्कार नहीं करते। लेकिन हम पत्रकार इतने संकीर्ण और हृदयहीन हैं कि उन्हें उनसे मिली जानकारियों के लिए कभी भूले से भी क्रेडिट नहीं देते। बावजूद इसके, वे प्रसन्नता से अगली बार के लिए फिर तैयार रहते हैं। झालानी जी का घर राजनीति और पत्रकारिता के शोधार्थियों के लिए सही गंतव्य है।

रवीशकुमार ने फेकन्यूज को लेकर बहुत सजगता भरी बातें कहीं। उन्होंने न सपने दिखाए और न मोहभंग वाली बातें कहीं। उनके कहने का तात्पर्य था कि मीडिया पर दबाव डालने वाली ताक़तें कितनी क्रूर क्षमताओं से सजी-धजी हैं। हर नव तानाशाह मीडिया की सवारी करना चाहता है। इसलिए एक अच्छे पत्रकार को लोकतंत्र के सजग प्रहरी के रूप में तैयार रहना चाहिए।

हर सत्तावादी और प्रत्येक शक्तिकामी चाहता है कि उसके 24 कैरेट के झूठ को सब लोग 42 कैरेट का सच मानकर चलें।

इस बारे में सांख्यदर्शन में कपिल मुनि ने एक बहुत अनुपम सूत्र दिया है :

गुणयोगाद् बंध: शुकवत्।।26/04

मतलब ये कि जिस तरह अपनी दुर्लभ विशेषताओं के कारण शुक को लोग पिंजरे में बंद कर लेते हैं, उसी तरह हर शक्तिशाली शासक कोशिश करता है कि सभी ख़ूबसूरत और विशेषताओं वाली प्रतिभाएँ उसके पिंजरे में रहें। इसके लिए वह हर कोशिश करता है।

दरअसल, पावर के लिबिडो की आख़िरी स्टेज लोकतंत्र के लिचगेट में तब्दील होना है। इसे पत्रकारिता ही समझा सकती है। न न्यायपालिका, न कार्यपालिका और न विधायिका।

सजग पत्रकारों का काम है कि वे सत्ता-प्रतिसत्ता और संभावित सत्ता के फैलाए झूठ का पूरी ताक़त से मुक़ाबला करें। ऐसा नहीं होगा तो अपनी मातृभूमि में हम कुछ भी निष्कलुष नहीं बचा पाएंगे। पत्रकारिता की मातृभूमि काे बचाने का प्रश्न तो है ही, हम इसे बचाने का काम कब शुरू करें, कह नहीं सकता; लेकिन अपनी हथेलियों की चिंगारियों को बचाना तो हमारा पहला काम है।

रवीशकुमार ने पत्रकारिता की मातृभूमि के नए नागरिकों के लिए नई संभावनाएं दिखाईं और बताया कि पत्रकारिता किस तरह एक ज़रूरी चीज़ है। इस पूरे माहौल पर उनका अपना दृष्टिकोण है, लेकिन आप उन्हें सुनेंगे तो शायद उनकी दृष्टि आपके विवेक से टकराकर नया बेहतर दृष्टिकोण पैदा करे।

रवीशकुमार ने अच्छी किताबों को पढ़ने की ज़रूरत बताई और कुछ किताबों के नाम भी गिनाए। भारतीय मनीषा की उज्ज्वल परंपरा के प्रतीक पुरुष निर्मल वर्मा की 'रात का रिपोर्टर' तो उन्होंने दिखाई भी।

यह किताब उन्होंने पढ़ने की ठीक सलाह दी; क्योंकि यह आपातकाल के दौर और सत्ता के नागरिक विरोधी आचरण को बेहद ख़ूबसूरती से चित्रित करता है। किसी समय कम्युनिस्ट रहे निर्मल वर्मा को आज का वह प्रगतिशील खेमा — जिसके प्रिय नायक रवीशकुमार बने हुए हैं — दक्षिणपंथी घोषित करता है। और यह दक्षिणपंथी लेखक (निर्मल वर्मा) 'रात का रिपोर्टर' में लिखता है: "एक क्षण अजीब सा भ्रम हुआ कि वह दिल्ली की सड़कों पर नहीं, कहीं भूले से बस्तर के जंगल में चला आया है- वैसे ही भक भक आग जला करती थी, घोटुल के चारों ओर फैली चाँदनी, धुएँ के गुंजल, दूर से ढोलक का धूमिल-मादक स्वर चला आता, जिसे सुनते ही जंगल के काले झुरमुटों से, पता नहीं कितने पुराने देवी-देवता बाहर निकल आते थे। ढोलक और चांदनी और महुआ में महकती लप-लपाती आग के चारों ओर घूमने लगते; आग जो सब कुछ खा लेती है- काग़ज़, मुर्दे, हड्डियाँ, सृष्टि का समूचा मांसल कायालोक।"

सचमुच, आज जो हालात हैं, उसमें दिल्ली बस्तर बनी हुई है, जहाँ लोकतंत्र की आवाज़ उठाने वाले प्रतिरोध के स्वर अर्बन-नक्सल या देशद्रोही घोषित हो जाते हैं। लोकतंत्र के उस समस्त कायालोक के मांसल हिस्से को चबाया जा रहा है, जो एक कंकाल पर प्राण-शक्ति से मंढ़े और चढ़े होने के कारण सम्मोहक जीवन की सृष्टि करता है।

रवीशकुमार जिस समय निर्मल वर्मा की 'रात का रिपोर्टर', सोवियत मार्क्सवादियों के निर्मम आलोचक और फ्र्यूडो-मार्क्सवादी समाजशास्त्री हर्बट मार्कूज की 'वन डायमेन्शनल मैन' और एक शायद 'दॅ एलीमेंट्स ऑव जर्नलिज़्म' को पढ़ने की चर्चा कर रहे थे तो मेरे मानस पटल पर उदयप्रकाश की 'वारेन हेस्टिंग्स का सांड', राहुल सांकृत्यायन की 'घुमक्कड़ शास्त्र', 'तुम्हारी क्षय' और अमर्त्य सेन की 'अतीत का वर्तमान' जैसी अनेक रचनाएं तथा नॉम चॉम्स्की की कृतियाँ कौंध रही थीं। मुझे लगता है, हर पत्रकार को ये किताबें अवश्य पढ़नी चाहिए।

पत्रकारिता को लेकर अभी बहुत प्रश्न उठ रहे हैं। हर कोई किसी के निशाने पर है। ऐसे हालात में जैसा कि हमारे एक साथी पत्रकार इस व्यवसाय को 'फोर्थ किलर ऑव डेमोक्रेसी' कहते हैं, चुनौतियां बहुत हैं। सत्ता के तेवर इतने टेढ़े-मेढ़े हैं कि आजकल लोकतंत्र का हर आंगन उन्हीं तेवरों को निहारते हुए नाच रहा है।

लेकिन पत्रकारिता की मातृभूमि के कणों की महक अभी बाकी है। इसीलिए तो एक अस्ताचलगामी सत्ता प्रतिष्ठान के प्रिय टीवी चैनल में महज चिटि्ठयां छांटने से अपनी पत्रकारिता की शरुआत करने वाला एक सामान्य सा लड़का एक सामान्य परिवार से सामान्य हालात में दिल्ली आकर बिना अंगरेज़ी-दां हुए आम लोगों की आवाज़ बनने को कोशिश करके अपनी छवि गढ़ता है और लोक से विमुख होने के कारण एक बेहतरीन प्रशिक्षित, तेजस्वी, अंगरेज़ी-दां और विराट व्यक्तित्व का धनी, जिसके पास एक समृद्ध पारिवारिक विरासत भी है, किसी और अवस्था को प्राप्त हो जाता है!

इस समय ये दोनों ही दो तरह के विचारों के प्रिय हैं; लेकिन यह कदाचित् दीवार पर लिखा सच है कि काैन क्या है और कहाँ है!

पत्रकारिता की मातृभूमि के नए नागरिकों को यह सच मानना चाहिए कि लोकतंत्र के सारवान संसार में कुछ भी अंतहीन नहीं है। न तो बेलगाम सत्ता का महासागर और न लोकतंत्र की कामनाओं का नन्हा झरना। नन्हा झरना नन्हे, लेकिन सतत संघर्ष से एक दिन महासागर नहीं तो एक स्रोतस्विनी तो बन ही जाएगा।

क्योंकि लोकतंत्र के सारवान संसार में कुछ चिरंतन है तो वह है सूचनाओं का लोक। और वह है मेरी मातृभूमि। हमारी पत्रकारिता।

और अंत में; पत्रकारिता में आने वाले नए मित्रों, इस प्रोफेशन में आने के बाद निराश होने वाले मित्रों और ताज़ा-ताज़ा टूटे दिल वाले मित्रों के लिए मीर का यह शेर बहुत ज़रूरी है :

बहुत आरज़ू थी गली की तिरी,

सो याँ से लहू में नहा कर चले।

(त्रिभुवन हरिदेव जोशी विश्वविद्यालय में ऐजंक्ट प्रोफ़ेसर हैं। यह टिप्पणी उन्होंने अपनी वॉल पर लिखी है।)

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सम्पादक

डॉ. लीना