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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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पत्रकारिता के छात्रों के लिए "गौशाला इन विश्वविद्यालय"

स्वागत योग्य, सराहनीय क़दम !!! 

तारिक फातमी/ पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले देश के एक प्रमुख संस्थान "माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय" ने पत्रकारिता के छात्रों के लिए गौ सेवा को अनिवार्य विषय के रूप में अपने पाठ्यक्रम में शामिल करने का फैसला किया है। इसके लिए विश्वविद्यालय परिसर में आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित "गौ शाला" स्थापित करने का प्रस्ताव है। विश्वविद्यालय के कुल सचिव की मानें तो प्राचीन नालन्दा विश्वविध्यालय में भी गौ सेवा एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता था और इसके लिए एक अलग विभाग भी था। 

पत्रकारिता के क्षेत्र में ऎसा क्रान्तिकारी क़दम उठाने वाला माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय शायद विश्व का पहला विश्वविद्यालय होगा जहाँ पत्रकारिता के छात्रों को गौ सेवा एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाएगा।पत्रकारिता के छात्रों के लिए ये विषय काफी रोचक होगा, जिसमें उन्हें गाय के जन्म से लेकर प्राकृतिक प्रजनन तथा कृत्रिम गर्भाधान और दूध देने की प्राकृतिक क्षमता से लेकर वैज्ञानिक तरीक़ों को अपना कर दूध देने की क्षमता में विस्तार की बारिकियों का ज्ञान प्राप्त होगा साथ ही साथ गौमूत्र के गुणों और उसके वैज्ञानिक महत्व पर शोध करने का अवसर भी प्राप्त होगा। इतना ही नहीं गौ सेवा के पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने से छात्रों के लिए रोज़गार के नए अवसर भी उपलब्ध होंगे। विभिन्न मीडिया हाउसों में अन्य पदों की तरह गौ सेवा संवाददाता के नये पद सृजित होगें तथा विश्वविद्यालय के इस कदम से पत्रकारिता के छात्रों को स्वंय रोज़गार जैसे गौ मूत्र से औषधि की फैक्ट्री लगाने, गोबर से बायो गैस का संयंत्र स्थापित करने, समेत अन्य विकल्प भी प्राप्त होंगे और सब से महत्वपूर्ण बात यह कि पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में गै-सेवा शामिल होने से इस क्षेत्र में रोजगार की बढ़ती संभावनाएं, हर वर्ष एक करोड़ युवाओं को रोज़गार उपलब्ध कराने की प्रधानमंत्री की घोषणा को मूर्त रूप देने में भी सहायक सिद्ध होंगी ।

आशा की जानी चाहिए कि देश के अन्य विश्वविद्यालय भी माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की इस पहल का अनुसरण करते हुए पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में गौ सेवा को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल करने की दिशा में सार्थक पहल करेंगे।

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना