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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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तिजोरी के झरोखे से झांकती पत्रकारिता

रमेश प्रताप सिंह। भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी सरकार के दो साल का कार्यकाल क्या पूरा हुआ, तमाम अखबारों के तेवर-कलेवर तो बदले ही पत्रकारिता के जेवर को भी उतारने में कोई कोर-कसर नहीं बाकी रखी। कल तक जो पत्रकारिता को लेकर बड़े-बड़े दावे करते थे, अपनी निष्पक्ष और काबिल पत्रकारिता का ढिंढोरा पीटा करते थे, सरकार के आगे अंग्रेजी के सी की मुद्रा में झुके नज़र आए। अब ये दीगर बात है कि उनके यहां जमे चाटुकार इसको उनके स्पाइनल कॉड की समस्या बता दें, मगर असल सच्चाई यही है कि आज मीडिया हाउसेज को सिर्फ और सिर्फ अपनी तिजोरियों की चिंता है। वो इसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

देश के तमाम बड़े मीडिया हाउसेज के गुरुवार के अंक जिसने भी देखे होंगे वो कम से कम इस बात से इत्तेफाक जरूर रखते होंगे  कि ये बड़े मीडिया हाउसेज ने पत्रकारिता को मंडिय़ा बना दिया है। इससे इसकी सूरत इतनी बिगड़ी है कि अब असली चेहरा पहचानना तक मुश्किल दिखाई देता है।

पत्रकारिता अब मजदूरी से भी गया बीता पेशा हो गया है। अब तो लोग ये कहते सुने जाते हैं कि समय पर वेतन मिल जाता है? तो चलो अच्छी बात है। आलम ये है कि सरकारी विज्ञापनों में नाक डुबा कर खाने वाले ये बड़े-बड़े अखबार नैतिकता के नाम पर नंगे हो चले हैं। इनके कर्मचारियों की हालत तो उनसे भी ज्यादा बदतर है जो किसी छोटी फैक्ट्री में काम करते हैं। ठेके पर काम करने वालों के साथ ठेकेदार और मालिक कैसा सलूक करते हैं ये किसी को भी बताने की जरूरत नहीं है। पत्रकारिता को इस चौराहे पर लाने के जिम्मेदार भी खुद पत्रकार ही हैं। पत्रकारों के शोषक भी पत्रकार ही हैं। ऐसे में कोई आखिर अपने आप से कैसे लड़े। सच कहूं तो पत्रकार अब प्रयोग करो और फेंक दो वाली व्यवस्था की ओर बढ़ चला है। बड़े अखबारों में अब यही चलन है। ये दीगर बात है कि इनमें पढऩे वाली सामग्री से ज्यादा ऐसी चीजें भरी होती हैं कि खरीदने के बाद कुढन होती है। अखबार भी किन शर्तों पर बेंचे जा रहे हैं ये भी किसी से छिपा नहीं है। सर्कुलेशन की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में आज 60 रुपए महीने के अखबार को बेंचने के लिए कंपनियां 200 रुपए का गिफ्ट पहले ही ग्राहक को थमा दे रही हैं। उसके बाद भी खरीददार नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में स्वच्छ और स्वस्थ पत्रकारिता की बात करना लोगों के गले नहीं उतरता। खैर गले तो हमारे भी नहीं उतर रहा है। चलिए सेठों की तिजोरी के झरोखे से झांकती इस पत्रकारिता पर आप तब तक इस पर मंथन कीजिए और मैं भी पानी पीकर मजबूत होकर कल फिर आता हूं...तब तक के लिए जय...जय।

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना