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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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कौन तय करेगा कि मीडिया में असल अजेंडा क्या है

हिंदी का "खान मार्केट क्लब" !

नरेंद्र नाथ/ आजकल सोशल मीडिया पर कुछ एलीट-हिंदीभाषी हिंदी को गाली देकर अपने लिए हिंदी का "खान मार्केट क्लब" बनाने के अभियान में हैं। उनके लिए अब जर्नल में लंबी-लंबी लैटिन शब्दों में छपी रिपोर्ट ही असली मीडिया है। सरोकार है। बाकी सब समाप्त है। बकवास है। कूड़ा है।

खैर, हम ऐसों में नहीं हैं कि एक को अच्छा के लिए दूसरों को गाली दूंगा। उन्हें खारिज करूंगा। न्यूयार्क टाइम्स से लेकर दूसरी जगह निश्चित बेहतर लेख छपते हैं। उन्हें भी पढ़ना चाहिए। लेकिन यह "खान मार्केट क्लब" कैसे तय कर लेंगे कि वही असली और मिशन पत्रकारिता है। अन्नपूर्णा देवी पर अगर हिंदी में श्रद्धांजलि हिंदी में नहीं छपी तो पूरी मीडिया बकवास?  ऐसे समीक्षा वाले लगता है खान मार्केट से निकलना नहीं चाहते हैं या खान मार्केट में कोई संभावना तलाश रहे हैं।

यह कौन तय करेगा कि असल अजेंडा क्या है? क्या एसएससी स्टूडेंट का मुद्दा उठाना मीडिया का काम नहीं है जिसे हिंदी मीडिया उठाता है? किसी सुदूर गांव में जब महामारी हो रही है और डॉक्टर को अस्पताल तक लाता है, कोई दलाल काम नहीं होने देते हैं तो बहुत कठिन परिस्थिति में काम करने वाली रिजनल मीडिया ही लोगों की आवाज उठाती है। उन्हें उनका हक दिलाती है। क्या यह मीडिया और उनका सरोकार नहीं है? क्या न्यूयार्क टाइम्स उनकी परेशानियों को छापता है? हां, अपने मुहल्ले, गांव, शहर के सरोकार से दूर कहीं परदेश के सरोकार को पढ़ाने की मीडिया को असल मीडिया कहते हैं तो यह भी एक पैमाना हो सकता है। आप अलग-अलग रिजनल अखबारों के लोकल संस्करण पढ़े, स्थानीय-आम लोगों के हितों के लिए लड़ने वाली मीडिया दिख जाएगी। हां, उनमें खान मार्केट टच नहीं है और आपको वह डाउन मार्केट लग सकता है। लेकिन जिन्हें ऐसा लगता है, वह बोलेंगे ही। आप खाये-पीये-अगाहे हैं और हर दिन होने वाली दिक्कतों से आपका वास्ता नहीं पड़ता है तो आप आंचलिक-क्षेत्रीय-हिंदी मीडिया की जरूरत-मजबूरी-ताकत को नहीं समझ पाएंगे। और उससे भी बड़ी बात कि आपको लोग समझा भी नहीं पाएंगे। क्योंकि यह आपके एलीट सोच को हर्ट करेगी और आप ऐसा होने नहीं देंगे।

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना