Menu

 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

Print Friendly and PDF

Blog posts : "फेसबुक से "

हर अखबार लगभग एक जैसा खराब है!

विष्णु नागर। जिंदगी भर हिंदी पत्रकारिता की। हिंदी अखबारों का आज का मानसिक दिवालियापन, सरकार की जीहुजूरी, हिंदुत्व का प्रोपेगैंडा और हिंदी को विकलांग बनाने की साजिश सी इस भाषा के अखबारों तथा टीवी चैनलों पर दिखाई पड़ती है, वह व्यथित करती है। गोदी चैनल तो दिनरात नफरत की मशीनगन बने …

Read more

पत्रकार या मेरा पत्रकार ?

यदि इसे हमारे पत्रकार लिखा जाता तो वही अर्थ और भाव निकलता जो इससे निकल रहा है ?

विनीत कुमार/ आप जिस मीडिया संस्थान के लिए रात-दिन एक किए रहते हैं, ख़ून-पसी…

Read more

ख़तरनाक काम हो चुका है पत्रकारिता

प्रश्नपत्र लीक मामले को उजागर करने वाले बलिया के दो ग्रामीण पत्रकार जेल में

शीतल पी सिंह/ निहायत ही ख़तरनाक काम हो चुका है मोदीजी के उदय के बाद । अब विभि…

Read more

अब पत्रकारिता नहीं, विज्ञापनकारिता !

वीरेंद्र यादव/ बातचीत की शुरुआत में छोटी-सी कहानी। बेटा है आदित्‍य। एक साथी आये थे घर पर। उन्‍होंने आदित्‍य से कहा कि पापा को बोलो कि पत्रिका में सिर्फ विज्ञापन निकालें। उसका उत्‍तर था- पत्रिका में पढ़ने के लिए खबर भी होनी चाहिए न।…

Read more

एक माध्यम के तौर पर टीवी तेजी से मर रहा है

मीडिया का शून्य लागत सामग्री फॉर्मूला 

विनीत कुमार। यूक्रेन-कीव में जो लोग मुश्किलों में फंसे हैं, वो बड़ी मुश्किल से विजुअल्स बनाकर अपने परिजनों से साझा कर रहे हैं. उनके परिजन भरी उम्मीद से उन्हें आगे बढ़ा रहे…

Read more

हिन्दी पत्रकारों का बुढ़ापा और भविष्य

संजय कुमार सिंह / छह आठ महीने पहले एक अनजान नंबर से फोन आया था। फोन करने वाले ने पूछा कि संजय जी आपका नंबर मेरे पास काफी समय से सेव है मैं पहचान नहीं पा रहा हूं कि आप कौन हैं। सभ्य और बुजुर्ग सी आवाज थी तो मैंने अपना परिचय बता दिया। उन्होंने भी अपना नाम और हाल-चाल सब बताया…

Read more

मीडिया के बड़बोलेपन में इन्डस्ट्री के भीतर का ख़तरनाक सन्नाटा बरक़रार

विनीत कुमार। एंकरिंग करते हुए दीपक चौरसिया का “बेउडा वीडियो” सामने आने के बाद लोग मुझे लिख रहे हैं कि आपको भले ही आश्चर्य हो रहा होगा, पूरी इन्डस्ट्री को पता है कि वो क्या करते हैं ?…

Read more

मिडिया का घेरा और स्वतंत्र राय

राम जी तिवारी/ किसी भी मुद्दे पर राय बनाते समय आप कौन सी तकनीक अपनाते हैं । एक तो यह होता है कि जो मुख्यधारा की मीडिया में बात प्रचारित की जा रही होती है, हम उसी के साथ अपना सुर भी मिलाने लगते है। दूसरे यह भी संभव है कि हम मुख्यधारा की मीडिया से इतना चिढ़े होते हैं कि वह जो भी क…

Read more

विदेश में भी भारत के पत्रकार चाटुकारिता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर रहे

गिरीश मालवीय। मीडिया की छवि देश में तो गोदी में बैठे मीडिया की बन ही गयी है पर अब तो विदेश में भी भारत के पत्रकार बेहयाई ओर चाटुकारिता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर रहे हैं.जना ओम मोदी कल जबरदस्ती यूएन में तैनात स्नेहा दुबे नाम की अधिकारी जिन्होंने दो दिन पहले यूएन के सम्मेलन म…

Read more

मीडिया ने सच बताने का दायित्व बिल्कुल किनारे कर दिया है

गिरीश मालवीय। कल दैनिक भास्कर के बहुत से संस्करणों के फ्रंट पेज पर एक लेख छापा गया जिसका शीर्षक था  'अब आधार जैसा यूनिक हेल्थ कार्ड मिलेगा जिसमें आपका पूरा मेडिकल रिकार्ड होगा'........दरअसल इस लेख में जो भी जानकारी दी गयी वो लगभग साल भर पुरानी थी.…

Read more

समस्या पर बात करना यदि निगेटिविटी, तो फिर पत्रकारिता का मतलब क्या

विनीत कूमार/ पॉजेटिव और निगेटिव को लेकर हमारी समझ इतनी सपाट है कि कारोबारी मीडिया को सकारात्मक न्यूज के नाम पर नयी दूकान की संभावना दिखने लग जाती है.…

Read more

अपने कार्यक्रम का वीडियो भी प्रधानमंत्री ही बना कर देंगे तो गोदी मीडिया क्या करेगा

रवीश कुमार। पिताजी के पूछने पर कि शाम को देर से क्यों लौटे ,कहां थे तो बेटों के पास जवाब तैयार रहता है। पिताजी, ट्यूशन के बाद हम लोग अमित के घर पर ग्रुप स्टडी करने लगे थे। वही हाल भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है। दुनिया खोज रही है कि भारत के प्रधानमंत्री अफगानिस्तान संकट …

Read more

एंकर को अहसास नहीं, उनका संवाददाता जान पर खेलकर लाइव कर रहा है

विनीत कुमार। अंजना ओम कश्यप को एहसास ही नहीं कि उनका संवाददाता जान पर खेलकर लाइव कर रहा है..

कंधार से आजतक के संवाददाता सिद्दिकी खां लाइव हैं. उनके चारों…

Read more

एक और मीडिया संस्थान पर छापेमारी!

सिलसिला सा बनता दिख रहा

उर्मिलेश / ये लो जी, एक और मीडिया संस्थान पर छापेमारी! यह लखनऊ(यूपी) स्थित एक चर्चित चैनल है: भारत समाचार चैनल. इसके संपादक के घर और दफ़्तर पर छापेमारी की खबर आ रही है! यह क्षेत्रीय चैनल कोरोना की तबाही और सरकारी लापरवा…

Read more

क्या न्यूज चैनल और सोशल मीडिया, मीडिया छात्रों को निठल्ला बना रहे हैं ?

विनीत कुमार। पेशे की बुनियादी बातें एकदम ठिकाने लगाकर इसकी या उसकी पक्ष लेने का सबसे ज़्यादा नुक़सान उन छात्रों और नए मीडियाकर्मियों को हुआ है जिनका सीखने-समझने और मेहनत करके इस पेशे में मक़ाम हासिल पर से तेजी से भरोसा उठने लगा है. उन्हें लगता है कि बिना विषय को समझे, ख़ूब मेहन…

Read more

क्या अखबार भी एक 'लक्जरी' है?

सीटू तिवारी। सुबह वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारीजी को देखा कि वो अपने ही भोजपुरिया ठसक अंदाज़ में अपने पोर्टल 'न्यूज़ हाट' पर अखबारों में छपी खबरों की समीक्षा कर रहे थे।  …

Read more

सहज संप्रेषण पत्रकारिता की पहली शर्त

ओम थानवी। पिछले साल मैंने एक टिप्पणी लिखी थी कि जब टीका शब्द हिंदी में है, हिंदी मीडिया ने वैक्सीन प्रयोग क्यों ओढ़ लिया है? बहरहाल, अच्छा लगा कि कुछ अख़बार-टीवी टीका-टीकाकरण भी लिखने लगे। …

Read more

आजीवकों में कोई ईश्वर का दूत नहीं होता

कैलाश दहिया/ महान आजीवक कबीर साहेब के नाम से लोग अभी भी गफलत में हैं। पिछले दिनों सोशल मीडिया पर भी गलत कयास लगाए गए हैं। वैसे तो कबीर साहेब को ले कर सारी बहसें खत्म की जा चुकी हैं। जिस में अच्छे-अच्छे खेत रहे। बावजूद इस के, निहित स्वार्थवश अभी भी कबीर पर लोग मुंह उठाकर बोलने लगत…

Read more

दोनों खबरें साथ होती तो पता चलता

अभी भी लेक्चर देने का काम चल रहा है और काम नहीं हो रहा है

रवीश कुमार/ प्रधानमंत्री धीरे धीरे पहले पन्ने की पहली हेडलाइन बनने लगे हैं। धीरे धीरे इसी तरह फिर से सब सामान्य होगा। इस खबर में जो उन्…

Read more

चौथा खम्भा आजकल इसी तरह से झूल रहा

रामजी तिवारी । अखबार का पहला पन्ना बता रहा है कि कोरोना-समय में सरकार चुस्त दुरुस्त है. अस्पताल की व्यवस्था चाक-चौबंद है. आक्सीजन की कोई कमी नहीं. टेस्ट और वैक्सिनेशन जोर-शोर से चल रहा है. दवाएं और परीक्षण सब जनता के लिए सुलभ है. …

Read more

20 blog posts

नवीनतम ---

View older posts »

पत्रिकाएँ--

175;250;cb150097774dfc51c84ab58ee179d7f15df4c524175;250;a6c926dbf8b18aa0e044d0470600e721879f830e175;250;5524ae0861b21601695565e291fc9a46a5aa01a6175;250;3f5d4c2c26b49398cdc34f19140db988cef92c8b175;250;53d28ccf11a5f2258dec2770c24682261b39a58a175;250;d01a50798db92480eb660ab52fc97aeff55267d1175;250;e3ef6eb4ddc24e5736d235ecbd68e454b88d5835175;250;cff38901a92ab320d4e4d127646582daa6fece06175;250;25130fee77cc6a7d68ab2492a99ed430fdff47b0175;250;7e84be03d3977911d181e8b790a80e12e21ad58a175;250;c1ebe705c563d9355a96600af90f2e1cfdf6376b175;250;911552ca3470227404da93505e63ae3c95dd56dc175;250;752583747c426bd51be54809f98c69c3528f1038175;250;ed9c8dbad8ad7c9fe8d008636b633855ff50ea2c175;250;969799be449e2055f65c603896fb29f738656784175;250;1447481c47e48a70f350800c31fe70afa2064f36175;250;8f97282f7496d06983b1c3d7797207a8ccdd8b32175;250;3c7d93bd3e7e8cda784687a58432fadb638ea913175;250;0e451815591ddc160d4393274b2230309d15a30d175;250;ff955d24bb4dbc41f6dd219dff216082120fe5f0175;250;028e71a59fee3b0ded62867ae56ab899c41bd974

पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना