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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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जिन्दगी के तल्खी को पुकारती आवाज़-ए-ज़मीर

पुस्तक समीक्षा/  एम. अफसर खां सागर/ ‘आवाज़-ए-ज़मीर’ हुकम सिंह ‘ज़मीर’ के 103 गजलों का संग्रह है। ज़मीर साहब पुलिस विभाग में उच्च पद पर रहते हुए भी इंसानी जिन्दगी के हर पहलू पर बड़े ही फलसफाना अंदाज में शेर कहें हैं। पुलिस सेवा के लिए राष्ट्रपति पदक, संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति मिशन के लिए चार पदक, बोस्निया में ‘स्टेबिलिटी फोर्सेज’ के साथ विशेष अभियान का पदक सहित देश-विदेश में पुलिस सेवा में उत्कृष्ट कार्य के लिए दर्जन भर से ज्यादा पदक मिले हैं। ज़मीर साहब ने जिन्दगी के तजुरबातों को, अवाम के दुःख को और समाज में फैले विसंगति को शायरी की शक्ल में ढ़ाला है। ज़मीर के गजलों को पढ़कर यह कहा जाता है कि उन्होने अपने अहसास को सलीके से अल्फाज देने की कोशिश की है। दिल की गहराइयों से जो दर्द निकलता है वही गजल की शक्ल अख्तियार करता है। उनकी गजल में हमारे अहद के कर्ब और उदासी की जिन्दा तस्वीर मुस्कुराने की कोशिश करती हुई दिखायी देती है।

इंसानी जिन्दगी के कठिन मरहलों को बयान करते हुए शायर लिखता है

जो दौर इश्क का गुजरा तो मैं ये समझा

मेरे ही साकिया ने मेरा खून किया है।

जिन्दगी के तवील सफर में आये उतार-चढ़ाव इंसान को बहुत कुछ सिखा जाते हैं। इन्ही तजुर्बों के सहारे ही इंसान जिन्दगी जीता है।

चन्द कतरे लहू चन्द टुकड़े गोस्त होगा बस

दिल के सिवा मेरी आंतों मे रखा क्या है।

अपनी शायरी में जमीर साहब ने मानो हक व सच बोलने का अहद कर रखा हो, तभी तो वो हकते हैं

मुझको दबाने की कोशिश न होगी कामयाब,

आवाज़-ए-ज़मीर हूं, बातिल नहीं हूं मैं।।

शायर ने जिन्दगी के उन लम्हों पर भी खूब तंज कसा है, जिसमें इंसान खुद को भूल बैठता है, बेखुद हो जाता है

मुहब्बत का ख्याल भी दिल से उतार बैठे हैं

बिकने की आरजू में सरे बाजार बैठे हैं।

इंसान जब जिन्दगी के भंवर में फंस जाता है तो वह अपने ईश्वर को याद करता है , उससे मदद चाहता है और उसी से सवाल करता है। इस पर शायर ने लिखा है

परवर दिगारे आलम सुन ले मेरा फसाना , इतने बड़े जहां में मैं खुद से हूं बेगाना।

अन्जाम क्या है मेरा आगाज तू बता दे, ना जीने का सामन है ना मरने का बहाना।।

शायरी नाम है जज्बात की सही तजुर्मानी, जिन्दगी के हालात के सही बयानी का, हुस्न की तस्वीरकशी और प्रकृति के चित्रण का, जिसमें सिर्फ आमद हो, रवानी हो सफाई हो ना कि बनावट। इन सभी पहलुओं पर जमीर साहब ने बडे ही बेबाकी से कलम चलाया है। जमीर साहब के जबान की सादगी, उनका अवाम से गुफ्तगू करने का हौसला व आसानगोई लोगों को जरूर पसंद आयेगा। उर्दू के शब्दों का रचना के नीचे अनुवाद देकर पाठक की सुविधा का भी ध्यान रखा जाना अच्छी बात है। निःसंदेह यह गजल संग्रहा पठनीय, उपयोगी एवं संग्रहणीय है।

पुस्तक-  आवाज़-ए-ज़मीर,                                                        

शायर- हुकम सिंह ‘ज़मीर’

प्रकाशक- माण्ड्वी प्रकाशन, गाजियाबाद,                                  

मूल्य- 200 रूपये

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सम्पादक

डॉ. लीना