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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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बिहार का आइना इन दिनों फूट गया है

जिला संवाददाताओं से कराया जा रहा विज्ञापन संग्रह, खबरों के प्रकाशन को विज्ञापन से जोड़ने का आरोप

मामले के छानबीन की मांग

मुंगेर/ 19सितम्बर। बिहार सरकार की अच्छाई और बुराई को उजागर करने की भूमिका निभानेवाला बिहार का हिन्दी और अंग्रेजी भाषाई आइना इन दिनों फूट गयाहै। बिहार सरकार के समक्ष गलत तस्वीर बिहार के हिन्दी और अंग्रेजी भाषा के दैनिक अखबारों में पेश की जा रहीहै। बिहार की राजधानी पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को खुश करनेके लिए प्रथम पृष्ठ पर कुछ उत्साहवर्द्धक और जीवंत खबरें छप जरूर  रही हैं जो बिहार जैसे पिछड़े राज्य के विकास के लिए जरूरी है । परन्तु बिहार के 38 जिलों में जिलाबार छपनेवाले हिन्दी अखबारों में जो खबरें इन दिनों छप रहीं हैं, वह खबरें सरकार के  प्रशासनिक और पुलिस पदाधिकारियों के मनोबल को तोड़ने के लिए छापी जा रही है।

बिहार के जिलों-जिलोंमें वितरित हो रहे जिलाबार हिन्दी अखबारों के संस्करणों के कार्यालयों के प्रमुख और जिला, अनुमंडल और प्रखंड स्तर के संवाददाताओं को माहबार विज्ञापन संग्रह करनेका टारगेट सौंप दिया गया है । विज्ञापन संग्रह का काम पत्रकारों का नियमतः नहीं है ,परन्तु कंपनी नियुक्ति  पत्र देने का प्रलोभन देकर नाजायज काम पत्रकारों से करा रही है और पत्रकारिता के पेशे को बदनाम कर रही है । और तो और,  विज्ञापन टारगेट न पूरा करनेवाले संवाददाताओं को अखबार से अलग करने की धमकी दे दी गई है। अपराध की खबरों को छोड़कर अन्य सभी प्रकार की खबरों के प्रकाशन को विज्ञापन से जोड़ दिया गयाहै । स्थिति यह है कि पूरे दिन संवाददाता खबरों की तलाश से ज्यादा विज्ञापन की तलाश में व्यतीत कर रहे हैं। मजे की बात यह है कि जिला स्तर पर सरकारी पदाधिकारियों और अखबार के माध्यम से अपनी बात कहनेवाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रतिमाह विज्ञापन देने का दवाब दिया जा रहा है। परिणाम यह है कि बिहार के 38 जिलों में प्रकाशित जिलाबार संस्करणों में छपनेवाली खबरों की विश्वसनीयता अब नहीं रह गई है। अखबार के आतंक के कारण जिला स्तर के सरकारी पदाधिकारी, कर्मचारी और राजनीतिक कार्यकर्ता खामोशी से सबकुछ सह रहे हैं।

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार काशी प्रसाद ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से पूरे मामले की छानबीन राज्य की खुफिया एजेंसी से कराने की मांग की है। उन्होंने सरकार को कहा है कि  पेड न्यूज के प्रचलन की जांच आसानी से की जा सकती है। हिन्दी अखबारोंमें छपनेवाली खबरोंसे जुड़ी संस्थाओं के प्रमुख से पूछताछ कर सच्चाई की पुष्टि की जा सकतीहै।

उन्होंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि यदि बिहार में पेड न्यूज की बढ़ती प्रवृत्ति पर तुरंत रोक नहीं लगाई जाती है, तो सबसे अधिक नुकसान सरकार को होगा क्योंकि खबरें कुछ वयां करेंगी और सच्चाई कुछ और ही होगी। जमीनी सच्चाई से रूबरू न होनेसे आगामी चुनाव में सरकार को काफी नुकसान भी हो सकता है ।
मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट
मोबाइल नं0-09470400813

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सम्पादक

डॉ. लीना