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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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पत्रकारिता जुल्म, अत्याचार और अधिकार हनन की कोख से जन्मी है: शाहीन नज़र

ख़ुदा बख्श लाइब्रेरी में भारतीय पत्रकारिता पर प्रो. शाहीन का व्याख्यान

पटना/ ‘‘हिन्दूस्तानी पत्रकारिता: उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी समाचारपत्रों का एक तुलनात्मक अध्ययन’’ के विषय पर दिनांक कल ख़ुदा बख्श लाइब्रेरी में एक व्याख्यान का आयोजन किया गया। प्रो. शाहीन नज़र, आई.टी.एम.आई., नोएडा को इसके लिये विषेष तौर पर आमंत्रित किया गया था।

व्याख्यान का उदघाटन करते हुए डा. शाइस्ता बेदार, निदेशक, ख़ुदा बख्श लाइब्रेरी ने कहा कि मैं इस लाइब्रेरी में प्रोफेसर महोदय का स्वागत करती हूँ, और उनका शुक्रिया अदा करती हूँ कि उन्होंने मेरे निवेदन को स्वीकार करते हुए, इस अहम विषय पर व्याख्यान देने के लिये अपना कीमती समय निकाला। आप गत 40 वर्षों से मीडिया से जुडे़ हुए हैं, और इस बीच उन्होंने पत्रकारिता के मैदान में काफी अहम काम किया है। यह विषय इसलिये भी अहम है कि आज जाली एवं स्वनिर्मित समाचार का जो जाल फैला हुआ है, मकड़ी जाल से एक आम पाठक अपने आप को कैसे सुरक्षित रख सकता है, इसकी जानकारी हम सब के लिये बहुत जरूरी है। विशेषकर नई पीढ़ी जो अपने जीवन के आरम्भिक पड़ाव में है, अपने जेहन व दिमाग को कैसे संतुलित कर सकती है। उसका मानसिक एवं शैक्षणिक विकास बहुत जरूरी है।

प्रो. शाहीन नज़र ने अपने व्याख्यान में कहा कि भारतीय पत्रकारिता ने वक्त के तकाजे के अनुसार परिवर्तन लाने की कोशिश की है, 1980 के दौर में पत्रकारिता का इतना फैलाव नहीं था जितना आज है, बिहार जैसे प्रदेश में उस समय पत्रकारिता की एक भी संस्था नही थी। लेकिन आज इसके संस्थायेँ हर जगह मिल जाएंगी। पत्रकारिता का अंदाज़ वक्त के तकाज़े के बदलता रहा है। सर सैयद के समय में पत्रकारिता का सुधारत्मक अंदाज था। अंग्रेजों के समय में इसका मिजाज़ तब्दील हुआ। ये पत्रकारिता के लिये चुनौतियों का दौर रहा। आपातकाल के बाद न्यूज़ का दायरा बढ़ा और तरह तरह के अखबारात और मैगज़िन निकलने शुरू हुए। आजादी के बाद फिर इसमें बदलाव हुआ और समाजी सरोकार से संबंधित जानकारियां उपल्बध करायी जाने लगीं। 1990 के बाद पत्रकारिता में दो बड़ा बदलाव हुआ। पहला बदलाव यह हुआ कि निजी टी. वी. का दौर शुरू हुआ दूसरा बदलाव यह हुआ कि vernacular news का फैलाव हुआ। अंगेजी के अलावा दूसरी भारतीय भाषाओं में इसका कदम जमने लगा।

प्रोफेसर महोदय ने कहा कि एक समय था कि टाइम्स ऑफ इंडिया भारत का प्रथम अखबार हुआ करता था। लेकिन समय के बदलाव के कारण आज ये 11 वें नम्बर पर आता है। ऐसा नहीं है कि इसका सरकुलेशन कम हुआ है। इसका बुनियादी कारण ये है कि हिन्दी पत्रिकाओं ने अपना कदम मज़बूती से गाड़ दिया है। आप ने यह भी कहा कि इन्टरनेट के कारण दुनिया में न्यूज़ पेपर की रीडरशिप कम होती जा रही है। लेकिन भारत में इसके विपरीत इसमें वृद्धि होती जा रही है। लेकिन सब से आश्चर्य की बात है कि आज भी गैरमुल्की खबरों विशेषकर बी.बी.सी. पर अधिक विश्वास किया जा रहा है। ये भारतीय मीडिया के लिये अच्छे संकेत नहीं हैं। मेनस्ट्रिम मीडिया अपना साख कायम रखने में नाकाम हो रहा है। इसलिये अल्टरनेटिव और डिजिटल मीडिया अपना पाँव फैलाता जा रहा है। चूंकि पहले सम्पादक को स्वत्रंता प्राप्त थी और अखबार के मालिक का उसपर कोई कंट्रोल नहीं था, इसलिये उस समय के अखबार आज भी सम्मान से देखे जा रहे हैं। लेकिन आज सम्पादक आजाद नहीं है वह दबाव में काम कर रहा है, इसलिये अच्छे परिणाम नहीं आ रहे हैं। लेकिन जब एक रास्ता बन्द होता है तो दूसरे रास्ते खुल जाते हैं और ये दूसरा रास्ता अल्टरनेटिव और डिजिटल मीडिया है। स्वत्रंता सेनानियों में से अधिकांश पत्रकारिता से जुड़े हुए थे। क्योंकि जब उनकी बातों और उनकी मांगों को अखबार ने छापना बन्द कर दिया तो उन्होंने स्वयं अपना रास्ता तलाश कर लिया।

चूंकि आज के व्याख्यान का विषय बडा रोचक और समय के तकाजे के अनुसार था, इसलिये इस पर कई प्रश्न भी किये गये जिनका संतोषजनक उत्तर प्रोफेसर महोदय ने दिया। इसके अलावा रियाज़ अजीमाबादी, सरूर अहमद और नाबिन्दो शर्मा जैसे विख्यात पत्रकारों ने भी अपने विचार श्रोताओ के सामने रखा।

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सम्पादक

डॉ. लीना