विनीत कुमार/ न्यूज़ पिंच पर मूनिडीह, धनबाद कोलियरी (बीबीसीएल का उपक्रम) को लेकर 48 मिनट 17 सेकेण्ड की अभिनव पाण्डे और इसके डिप्टी मैनेजर सन्नी राव के बीच की बातचीत आयी है. शुरु के एक-दो मिनट तो आप ज़रूर अभिनव पाण्डे की भदेस शैली में की जाती रही रिपोर्टिंग-बातचीत के प्रभाव में इसे देखना जारी रखते हैं…
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एक इंजीनियर के आगे हांफती मीडियाकर्मी की भाषा
कॉस्ट्यूम पत्रकारिता के दौर में साख की चिंता किसे है
हिन्दी चैनल के न्यूज एंकरों में क्लास चेंज करने और उससे भी कहीं ज़्यादा “चेंज हो चुका है” दिखाने की तड़प चरम पर है
विनीत कुमार/ ये स्क्रीनशॉट किसी जूते के विज्ञापन का हिस्सा नहीं है और न ही सूटिंग-शर्टिंग का ही और न ही मैंने मोहल्ले के टेलर की दूकान पर चिपकी ऐसी दर्जनों तस्वीरों में एक पसंद आ गयी…
महंगा होता जीवन सस्ता होता लेखन
प्रियदर्शन / 1. साल 1993 में मैं दिल्ली आया था- अगले तीन साल मैंने फ़्रीलांसिंग की। 1995 में शादी की तब भी फ्रीलांसर ही था- एक तरह से बेरोज़गार। स्मिता के घरवाले परेशान थे कि लड़का करता क्या है। लेकिन फ्रीलांसिंग में मैं भी फिर भी इतने पैसे कमा लेता था कि छोटी-मोटी नौकरियों के प्रस्ताव ठुकरा सकूं।
न्यूज एजेंसी के साथ पुलिसिया दुर्व्यवहार
वजह- मीडिया संस्थानों को धमकाने वाले सरकारी कदमों पर पत्रकार "मैनू की" से ऊपर उठ कर बारी बारी चारण भाट बनते गए...
शिशिर सोनी/ जिस तरह हमारे पत्रकार साथियों को कल #UNI #यूनीवार्ता के दफ्तर से खदेड़ा गया, महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई, न्यूजरूम में दिल्ली पुलिस ने घुसकर गुंडई की है वो आपातकाल…
पत्रकारिता की सीमाएं
पत्रकार जज नहीं
प्रेमेन्द्र / एक अति सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार मित्र कानूनी पचड़े में फंसे हैं। कल उनका फोन आया और इस पर चर्चा हुई। अक्सर पत्रकार कानूनी पेंच में फंसे नजर आते हैं। आए थे पत्रकारिता करने और अब कोर्ट कचहरी के चक्कर लग रहे। इससे बचने के लिए जरूरी है कि पत्रकारिता की सीमाओं को समझा जाए।
…हो सके तो फिर पत्रकारिता शुरू कीजिए!
खरी खरी
शिशिर सोनी/ कुछ पत्रकार रहे साथियों को राजनीतिक दलों ने अपना मुलम्मा चढ़ा दिया है। कुछ उनके ही रंग में रंग गए हैं। कुछ रंग पाने के लिए छटपटा रहे हैं। कुछ को दुमछल्ला बना लिया गया है। कुछ चाभी के छल्ले भी बनने को आतुर हैं। पत्रकारिता जाए भाड़ में !
भांडों की एक फौज पत्रकारों के बीच खड़ी…
पत्रकारों के लिए अंधा कुआं बन गया है सेंट्रल हॉल का प्रेस दीर्घा
वीरेंद्र यादव/ पटना/ सोमवार को विधानमंडल के बजट सत्र का पहला दिन था। हर तरफ रौनक ही रौनक। दोनों सदनों के मुख्य द्वार को फुलों से सजाया गया था। दरवाजे पर स्वागत के लिए मार्शल तैनात थे। पूरे परिसर को छावनी में बदल दिया गया था। सत्र के दौरान आमतौर पर यही नजारा रहता है। सेंट्रल हॉल बनने के बाद काफी कुछ…
जब पत्रकार संकट में हो, तो मानिए कि पत्रकारिता सही दिशा में है
अमन नामरा/ इंदौर को देश का सबसे साफ शहर कहा जाता है। यही उसकी पहचान है, यही उसका ब्रांड है। लेकिन इसी शहर में, बीते कुछ दिनों में, सीवर मिला पानी पीने से पंद्रह लोगों की मौत हो जाती है। यह संख्या सिर्फ़ आंकड़ा नहीं है—यह राज्य, व्यवस्था और दावों पर एक सीधा आरोप है। ऐसे में सवाल उठना चाहिए था। और सवा…
10 साल बाद टूटा कॉरपोरेट घमंड!
दैनिक जागरण जैसे बड़े मीडिया हाउस के खिलाफ एक कर्मचारी की ऐतिहासिक जीत!
संजय सेठ ने वो कर दिखाया जो बहुत कम लोग कर पाते हैं
2013 में वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने की “सज़ा” दी गई —
सीनियर कर्मचारी को जम्मू-कश्मीर ट्रांसफर
मैसेज साफ था: झुको या निकलो!
लेकिन संजय सेठ न झुके, न टूटे।
कानून…
हे पत्रकारिता के भीष्म पितामह… नीतीश मदहोश हैं या आप?
जीवन ज्योति/ अभी कुछ ही दिन पहले बिहार के मीडिया गलियारों में एक सनसनी दौड़ी कि “नीतीश कुमार बेसुध!” कहा गया कि वे अपने पुराने साथी को पहचान नहीं पाए, यहां तक कि नालंदा में हिलसा कहां है, ये तक पूछ बैठे।
फिर दो दिन बाद उसी मीडिया ने खबर दौड़ाई कि “सीएम नीतीश गुस्से में तमतमाए, अशोक चौधरी पर फायर!…
अड़ानी संबंधित वीडियो यूट्यूब और सोशल मीडिया से हटाने के आदेश
शीतल पी सिंह / सरकार ने आदेश निकाला है कि देश के कई प्रमुख पत्रकारों , जिनमें ठाकुरता, अभिसार शर्मा, ध्रुव राठी, रवीश कुमार, अजीत अंजुम आदि अनेक शामिल हैं, वे तुरंत देशसेठ गौतम अड़ानी और उनकी कंपनियों की कारगुज़ारियों से संबंधित अपने सभी वीडियो यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया माध्यमों से हटा लें ।
इस…
इस तरह मर रहा है हमारा टेलिविज़न !
“एनडीटीवी इंडिया का युवा मीडियाकर्मी सुमित सर-सुमित सर कर रहा है और सुमित सर( सुमित अवस्थी ) हैं कि सोफे पर पड़े मोबाईल फोन की गिरफ़्त से बाहर ही नहीं आ रहे.”
विनीत कुमार/ एक दृश्य माध्यम( विजुअल मीडियम ) के तौर पर टेलिविज़न तेजी से मर रहा है. ख़ासतौर पर समाचार चैनल ने संभावनाओं से भरे इस माध्यम…
मीडिया उनके मुंह में डालकर कुछ लिख दे रहा है
हेमंत/ नीतीश जी की हालत ऐसी हो गयी है ब्राह्मणवादी सवर्णवादी मनुवादी जातिवादी मीडिया उनके मुंह में डालकर कुछ लिख दे रहा है। सुना दे रहा है। दिखा दे रहा है। नीतीश जी कुछ कर नहीं पा रहे हैं क्योंकि इसके पीछे भाजपा है। और नीतीश जी ने जिन लोगों को पार्टी सौंप रखी है, वे भाजपा से मिले हुए हैं।
नीतीश ज…
अपराधियों का वर्चस्व बढ़ाने में मीडिया की भूमिका रही है
अनंत/ बिहार के पत्रकारों ने कट्टधारी को बड़ा डॉन बना दिया। चंदन मिश्रा एक शातिर अपराधी था जिसकी हत्या गैंगवार में हुई है। मीडिया में ऐसा कोहराम मचा मानों मृतक मासूम था। जितना इस खबर दिखाया गया अपराधी को अपराध की दुनिया में उतनी ही स्थिति मजबूत हुई। अब तो उस शूटर रेट और खौफ भी बढ़ गया है। उसे जो नहीं…
जनता को मरने लायक बनाने वाला गोदी मीडिया है
केवल मोदी बनाम राहुल का नाम लेकर गोदी मीडिया के टर्म को reduce नहीं कर सकते हैं
रविश कुमार/ इन दिनों कई पत्रकार गोदी मीडिया के टर्म को खारिज करने में लगे हैं,क्योंकि उन्हें पता है कि उनके काम का मूल्यांकन इस पैमाने से हो रहा है और होगा। वे अपनी पत्रकारिता का बचाव नहीं कर पाते हैं तो गोदी मीडिया क…
मीडिया के छात्रों के लिए आपातकाल का मतलब
विनीत कुमार / आज दि इंडियन एक्सप्रेस ने मुख्य पृष्ठ पर वरिष्ठ पत्रकार कोमी कपूर का संस्मरण प्रकाशित किया है. आज से 50 साल पहले जो आपाकाल लागू किया है, तब क्या स्थिति रही ? कपूर ने इसी आपातकाल पर “Emergency” शीर्षक से पूरी किताब भी लिखी है जिसे लेकर पिछले दिनों बनी फ़िल्म में ठीक से क्रेडिट न दिए जान…
सेल्फ पब्लिशिंग के दौर में संपादक का काम ही क्या बचा है !
लेकिन मुझे हर वक़्त एक संपादक का साथ चाहिए
विनीत कुमार/ संपादक जैसी अब कोई संस्था बची नहीं है. संपादक अब सब मैनेजर हो गए हैं. मार्केटिंगवालों के आगे संपादक की चलती कहां है ? सेल्फ पब्लिशिंग के दौर में संपादक का काम ही क्या बचा है ! सोशल मीडिया के दौर में तो हर लेखक के भीतर संपादक पैदा हो गया है, …
मनी के बदौलत मिडिया पर कसता शिकंजा
अखिलेश कुमार/ आमलोगों के बीच हकीकत बयां करने का माध्यम पहले समाचारपत्र तथा रेडियो और बाद के दिनों में टेलीविजन रहा है। जबकि हाल के वर्षों में सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ा और अभिव्यक्ति की आजादी के साथ सुचनाओं के आदान-प्रदान का एक सशक्त माध्यम भी साबित हुआ है।
लेकिन जिस तरह से मिडिया के बड़े बड़े प…
स्वस्थ दिमाग़ का मीडिया ऐसा तो नहीं होता !
विनीत कुमार/ न्यूजरूम का जो हाल मीडियाकर्मियों ने बना दिया है, एक संवेदनशील, तार्किक और समझदार व्यक्ति या तो यहां लंबे समय तक टिक नहीं सकता और यदि टिका रह गया तो उसके मानसिक स्वास्थ्य का जर्जर होना तय है.
मैं ग़ौर करता हूं कि स्क्रीन के कई उभरते चेहरे एकदम से ग़ायब हो जाते है. कुछ दिनों तक मैं अप…
अगर आपमें पत्रकारिता का थोड़ा कुछ भी बचा होता !
उर्मिलेश/ न्यूज़ चैनलों ने अपने स्टूडियो में ‘वार-रूम’ बनायें है. शायद ‘वार’ भी चाहते होंगे! टीआरपी उछलेगी तो कमाई भी! इनके चलाने वाले जानते हैं कि आज के दौर में हर युद्ध मनुष्यता के हितों की क़ीमत पर होता है! पर इनके 'कवरेज' में सिर्फ युद्धोन्माद नजर आता है, समझ और विवेक सिरे से गायब! पता नहीं ये स…
नवीनतम ---
- डब्ल्यूजेएआई बिहार अगस्त में आयोजित करेगा राज्यस्तरीय कार्यक्रम
- झारखंड में डब्ल्यूजेएआई की नई टीम गठित
- एमसीयू में तनाव प्रबंधन पर कार्यक्रम
- अमरनाथ झा : पत्रकारिता से नदी-पानी के जनसरोकार तक की अविस्मरणीय यात्रा
- डब्ल्यूजेएआई बिहार प्रदेश की नई कार्यकारिणी का गठन
- डॉ. अंबेडकर का बौद्ध धर्मांतरण एक प्रयोग था जो फेल हो गया
- आपत्तिजनक पोस्ट करने वालों के विरुद्ध बिहार पुलिस की कार्रवाई
- एक इंजीनियर के आगे हांफती मीडियाकर्मी की भाषा
- कॉस्ट्यूम पत्रकारिता के दौर में साख की चिंता किसे है
- स्मृति कल्प का आयोजन 14 जून को
- अपने समय से संवाद का नाम है ‘संजय उवाच’
- पत्रकार या 'पत्थरकार'
- माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!
- मिशन, बाजार और साख का संकट
- हिंदी पत्रकारिता निश्चित रूप से और आगे बढ़ेगी
- हिन्दी पत्रकारिता यानि तीन सदी की जनसंचारीय यात्रा
- संघर्ष, चेतना और जनसरोकारों की गौरवगाथा
- खबर से एजेंडा तक: जब हिंदी पत्रकारिता ने बदली अपनी राह
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सुख मंगल सिंहJuly 4, 2026
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कैलाश दहियाJuly 3, 2026
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Kailash DahiyaJuly 3, 2026
-
Omprakash KashyapJune 30, 2026
-
foo barMarch 2, 2025
-
रवि अहिरवारJanuary 6, 2025
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पंकज चौधरीDecember 17, 2024
सम्पादक
डॉ. लीना
