हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष
हरेन्द्र प्रताप सिंह/ वर्ष 2026 की इस मई में हिन्दी पत्रकारिता ने दो सौ साल पूरे कर लिये। इस अवधि में हिन्दी पत्रकारिता ने तीन सदी की अपनी यात्रा पूरी की। पत्रकारिता से वह मीडिया बन गई। इस दौरान पूरी दुनिया बदल गई। पत्रकारिता का बदलना भी स्वाभाविक है। साप्ताहिक हिन्दी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड (1826) से लेकर दैनिक द्विभाषी हिन्दी अखबार समाचार सुधावर्षण (1854) तक के युग ने प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन (1857) की राष्ट्रीय नींव तैयार की और बहादुर शाह जफर को फिर से हिन्दुस्तान का बादशाह बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई। भाषाई समाचार पत्र पयाम-ए-आजादी ने न सिर्फ अपनी पत्रकारिता से आजादी की चिंगारी को भड़काया बल्कि अपने नाम के अनुरूप ब्रिटिश हुकूमत को भारत की आजादी को स्वीकार करने का स्पष्ट संदेश भी दिया। अंग्रेजों ने इस सांकेतिक भाषा को समझ लिया और अगले नब्बे साल भारत से शांति से निकलने के लिए मार्ग तलाशने में लगाये। इस दौरान अंग्रेजों ने अनेक भारतीय मार्गदर्शक भी ढूंढने शुरू किये जो उन्हें सुरक्षित निकालने में सहयोग कर सकें। हिन्दी पत्रकारिता में 1857 के बाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र तक का समय हिन्दी भाषा के विकास तथा वैचारिक पत्रकारिता का युग है। स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम चरण यानि 1947 तक पहुंचते पहुंचते हिन्दी पत्रकारिता ने राष्ट्रीय आकार धारण कर लिया और इसमें बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना आजाद, गणेश शंकर विद्यार्थी, भगत सिंह, श्रीप्रकाश, माखनलाल चतुर्वेदी, बालमुकुंद गुप्त, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, रामवृक्ष बेनीपुरी, यशपाल, बाबू विष्णु राव पराड़कर जैसे विचारक पत्रकारों तथा क्रांतिकारी पत्रकारों ने अग्रणी भूमिका निभाई।
भारत बीसवीं सदी में समय से कुछ पहले ही आजाद हो गया। लेकिन इसकी बड़ी कीमत भारत को विभाजित होकर चुकानी पड़ी। अंग्रेज भारत के अनेक टुकड़े करने में सफल रहे। सबसे बड़ा झटका था भगत सिंह को फासी और सुभाष चन्द्र बोस का अचानक वायुयान दुर्घटना में गायब हो जाना। उससे भी बड़ा झटका था देशी नेताओं में सत्ता को लेकर आंतरिक राजनीति और महात्मा गांधी को राजनीतिक रूप से महत्वहीन बना देना। इसलिए 1826 से लेकर 1947 तक की लगभग सवा सौ साल की हिन्दी पत्रकारिता सबसे चुनौतीपूर्ण रही और उसने पत्रकारिता को मिशन के रूप में व्यापक विस्तार दिया और उसी का परिणाम था कि स्वतंत्र संवैधानिक भारत में हिन्दी देश की आधिकारिक राजभाषा बनने में सफल रही। हिन्दी और देश को इस मुकाम तक लाने में हिन्दी के छोटे समाचार पत्र, पत्रिका, रेडियो, आकाशवाणी तथा फिल्म एवं साहित्य से जुड़ी हस्तियों का विशेष योगदान रहा। इस युग में पूर्णकालिक पत्रकार तथा अल्पकालिक पत्रकार दोनों ने मिलकर मिशन की भावना से काम किया। इसमें कोई शक नहीं कि युवा पत्रकारों ने आजादी की लड़ाई में प्रथम पंक्ति से योगदान दिया।
लेखक देश के वरिष्ठ पत्रकार हैं और लगभग आधी सदी से मीडिया में सक्रिय हैं।

