हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष
संजय कुमार / मीडिया यानी चौथे स्तंभ की तस्वीर आज बदल चुकी है। मीडिया की पूरी दुनिया सतरंगी हो चुकी है। प्रिंट से इलेक्ट्रोनिक फिर न्यू या सोशल मीडिया और अब एआई ने बदलाव चरम पर पहुंचा दिया है। इसके बावजूद मूल पत्रकारिता कहीं न कहीं जीवंत है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारिता कभी एक ‘मिशन’ हुआ करता था। गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’, बाबूराव विष्णु पराड़कर का ‘आज’ और प्रभाष जोशी का ‘जनसत्ता’ जैसे अखबारों की स्याही में सिर्फ खबर नहीं, जनचेतना की आवाज़ थी। पत्रकारिता का उद्देश्य था सरकार या सत्ता की बात को जनता तक पहुंचाना, साथ ही उनसे जनता के सवाल करना, समाज को सच दिखाना और नागरिक को जागरूक बनाना। लेकिन आज जब हम हिंदी पत्रकारिता की ओर देखते हैं तो तस्वीर बदल चुकी दिखाई देती है। खबर अब सिर्फ सूचना नहीं रही। वह विचार, प्रचार और एजेंडा का माध्यम बनती जा रही है। टीवी स्टूडियो की चीखती बहसें, यूट्यूब के सनसनीखेज थंबनेल और अखबारों की ‘प्लांटेड’ खबरें सब मिलकर यह तय करने लगे हैं कि जनता क्या सोच रही है ।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पत्रकारिता बदली और दिनों दिन बदल रही है। प्रश्न यह है कि वह बदली कैसे, और इसकी सबसे बड़ी कीमत कौन चुका रहा है? जवाब साफ है आम लोग। आजादी से पहले हिंदी पत्रकारिता का सीधा लक्ष्य था ‘स्वराज’। आजादी के बाद उसका उद्देश्य बना ‘राष्ट्र निर्माण’। 1975 में लगी इमरजेंसी में हिंदी पत्रकारिता ने सेंसरशिप के बावजूद प्रतिरोध की मिसाल पेश की थी। विरोधी स्वर से पत्रकारिता लबरेज रही। दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता के खाली संपादकीय पन्ने आज भी उस दौर के साहस और सत्ता से लड़ते रहने की गवाही देते हैं। लेकिन 1990 का दशक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उदारीकरण आया, विज्ञापन बाजार फैला और निजी टीवी चैनलों का दौर शुरू हुआ। खबर 24x7 से तस्वीर बदल गई। कहा जाने लगा कि प्रिंट मीडिया ख़त्म हो जायेगा । लेकिन प्रिंट जिन्दा है। ‘सबसे तेज’ की होड़ ने पत्रकारिता को सूचना से अधिक प्रदर्शन बना दिया। खबरें बिकने लगी। आरोप लगने लगे। धीरे-धीरे संपादक की जगह मार्केटिंग और मालिकाना हित निर्णायक होने लगे। पत्र और पत्रकारिता पर बाजार हावी हुआ और व्यवसाय काबिज हो गया। हिंदी का पाठक वर्ग दुनिया में सबसे बड़ा भाषाई मीडिया बाजार है। यही उसकी ताकत भी बना और कमजोरी भी। विज्ञापन बढ़े, संसाधन बढ़े, लेकिन साथ ही यह सिद्धांत भी मजबूत हुआ जो बिकता है, वही दिखता है। खबरें बेचीं जाने लगी। पाठक की नजर में मीडिया सवालों के घेरे में आया। जिन पत्र या पत्रकार में पत्रकारिता की जड़े बची थी वे दरकिनार होते गये और अपनी व्यक्तिगत पत्रकारिता शुरू कर दी।
मिशन पत्रकारिता का एजेंडा पत्रकारिता में ढल जाना। बदलाव की प्रक्रिया रही। देखें तो हर दिन सैकड़ों घटनाएँ घटती हैं, लेकिन मीडिया उनमें से चुनिंदा खबरें दिखाता है। कौन सी खबरें प्रमुख होंगी, यह अक्सर पत्रकारिता नहीं बल्कि संस्थान की वैचारिक या व्यावसायिक प्राथमिकताएँ तय करती हैं, कह सकते हैं एडिटोरियल लाइन। जन सरोकार के मुद्दों की जगह मुद्दों से भटकाने वाली खबरें जिसे हम एजेंडा सेटिंग कह सकते हैं ।
एजेंडा पत्रकारिता की भाषा बदल गयी। देखें तो शब्द सिर्फ सूचना नहीं देते, दृष्टिकोण भी गढ़ते हैं। ‘प्रदर्शनकारी’ और ‘उपद्रवी’, ‘शहादत’ और ‘हत्या’, ‘घुसपैठिया’ और ‘शरणार्थी’ इन शब्दों का चयन ही दर्शक की सोच को प्रभावित करता है। एजेंडा पत्रकारिता में भाषा निष्पक्ष माध्यम नहीं, बल्कि वैचारिक हथियार बन गयी है। खबरों में झूठ परोसा जाने लगा वह भी पूरे भरोसे के साथ। ख़बरों के साथ बड़े -बड़े शब्द जुड़े, ताकि भ्रामक खबर भी सही लगे? ऐसे में सरकार और कुछ मीडिया हॉउस सामने आये और भ्रामक ख़बरों का फैक्ट चेक करने की परिपाटी शुरू की ।
इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने हद कर दी। चीख पुकार उसकी पहचान बन गयी। खबर हो या चर्चा कार्यक्रम सब में चीखती बहसें लोकतांत्रिक विमर्श कम और शोर ज्यादा लगती हैं। एंकर संचालक नहीं, निर्णायक बन बैठता है। भाषा ने आप खोया, लेकिन एंकर नहीं चेते, हद तो तब होती है जब कभी कभी खुद किसी पार्टी का प्रवक्ता बन जाता है। एक पक्ष को अधिक समय और दूसरे को प्रतीकात्मक जगह देकर बहस को पहले से तय दिशा में मोड़ा जाता है, और एजेंडा तय कर देता है। स्वस्थ चर्चा कभी-कभी मारपीट या गाली गलौज तक पहुंच जाता है। मकसद साफ होता है विषय का समाधान नहीं, उत्तेजना पैदा कर, एजेंडा को स्थापित कर दो। पत्रकारिता का मूल सिद्धांत था बल्कि है, खबर और विचार अलग रहें। लेकिन आज रिपोर्टिंग में ही टिप्पणी और ज्ञान घुल गई है।
देखें तो एजेंडा पत्रकारिता में खबर की उम्र बहुत छोटी होती है। कोई हादसा दो दिन सुर्खियों में रहता है, फिर नया मुद्दा आ जाता है। या ला दिया जाता है। क्योंकि उद्देश्य जनहित नहीं, तात्कालिक सनसनी फैलाना और मुद्दों से भटकाना भी होता है। आज बड़े मीडिया संस्थानों का बड़ा हिस्सा कॉरपोरेट घरानों या राजनीतिक हितों से जुड़ा है। मीडिया अब सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं, प्रभाव का साधन भी बन चुका है। जब मालिक के व्यावसायिक या राजनीतिक हित दांव पर हों, तब संपादकीय स्वतंत्रता की बात बेमानी हो जाती है। ऊपर से टीआरपी का खेल है। डिजिटल दौर में सफलता का पैमाना दर्शकों की संख्या और क्लिक बन गया है। खबरों को छोटे पर्दे पर जिस भयावहता के साथ परोसा जाता है देख कर डर लगने लगता है। मीडिया अब नैरेटिव तय करती है। इससे पत्रकारिता की पारंपरिक सत्यापन प्रक्रिया कमजोर हुई है।
हिंदी पत्रकारिता दिवस या चर्चा में कितना भी अच्छी-अच्छी बात कर लें, हालात ठीक नहीं है। हिंदी पत्रकारिता से जुड़े जिला संवाददाता बेहद कम वेतन और अस्थिर नौकरी में काम करते हैं। ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकारिता को लेकर भी सवाल उठता रहता है। आज हिंदी यो कहे तो पत्रकारिता को लेकर विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो गया है। मीडिया पर से दर्शकों का विश्वास का हटना, भरोसा का टूटता दर्शाता है कि पत्रकारिता खतरे में है। मीडिया पर अविश्वास लोकतंत्र के लिए गंभीर संकट है, अहम् सवाल है जिस पर विचार करना होगा। स्वतंत्र और आलोचनात्मक पत्रकारिता करने वाले कई पत्रकार मुख्यधारा से बाहर हो चुके हैं। नई पीढ़ी भी पत्रकारिता की बजाय पीआर, कंटेंट क्रिएशन या कॉरपोरेट कम्युनिकेशन की ओर आकर्षित हो रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्वतंत्र पत्रकारिता ने एक वैकल्पिक रास्ता खोज लिया है। सोशल मीडिया में सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल यह साबित कर रहे हैं कि दर्शक अब भी विश्वसनीय पत्रकारिता के पक्ष में है और उसके लिए भुगतान करने को तैयार हैं। कई स्वतंत्र पत्रकार गांवों, कस्बों और हाशिये के समाज की कहानियाँ सामने ला रहे हैं। हिंदी पत्रकारिता आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। ऐसे में खबर, सूचना, जानकारी आदि लोकतंत्र की साँस है, उसका दम घूंट रहा हैं। अगर स्वस्थ्य पत्रकारिता नहीं हुई तो, भविष्य में जवाब तो पत्रकारिता के संचालकों को ही देना ही होगा?

