कैलाश दहिया/ आजीवक चिंतन के आने के साथ सोशल मीडिया पर विचार-विमर्श की दिशा ही बदल चुकी है। अब आप किसी दलित को रोते और स्यापा करते नहीं देखेंगे। दलितों की रोती-बिलखती हुई आत्मकथाओं का दौर लगभग समाप्तप्राय है। अब तो दलितों के वर्णवादी- जातिवादियों से संघर्ष को दर्शाती आत्मकथाओं के दौर की आहट सुनाई दे रही है। यहां तक की अब जय भीम और नमो बुद्धाय का नारा भी लगभग गायब हो गया है। जय भीम का नारा अब केवल कुछ द्विज और ओबीसी लगाते देखे जा सकते हैं। यहां बताया जा सकता है जब कोई गैर दलित हमारे किसी महापुरुष के नाम पर नारे लगाता है तो समझ जाइए वह महापुरुष और उनका चिंतन दलितों के किसी काम का नहीं। यूं, नवबौद्धों में अब आजीवकों से विमर्श की क्षमता खत्म हो चुकी है। नवबौद्ध केवल आजीवकों के साथ गाली-गलौच और कु-तर्क करते ही देखे जा सकते हैं। बताया यह भी जाना है, महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर द्वारा शुरू किए गए दलित और स्त्री विमर्श का ही विस्तार है सोशल मीडिया पर आजीवक चिंतन को लेकर चल रही बहस।
इसी क्रम में शीलबोधि नाम के नवबौद्ध ने डॉ. संतोष कुमार की दिनांक 15 जून, 2026 की फेसबुक पोस्ट पर अपने कमेंट में लिखा है -"बाबा साहेब आंबेडकर से ज्यादा समझदार और अध्ययनशील और समाज की उन्नति के लिए काम करने वाले इस व्यक्ति की बात समाज क्यों नहीं मान रहा है, मान लो भाई कहीं ये भी डॉ. धर्मवीर की भांति गुमनामी में न चला जाए। क्योंकि इनके गुरु की करनी और कथनी में भयंकर अंतर था। इसलिए वह अपने आप अप्रासंगिक हो गए। यह तो अभी से प्रासंगिक हैं।" इन के इस कथन से ध्वनि निकलती है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर से ज्यादा पढ़ा लिखा और शिक्षित दलितों में हो ही नहीं सकता। इस से ज्यादा मूर्खतापूर्ण विचार की कल्पना करना मुश्किल है।
सर्वप्रथम तो पूछा जा सकता है, इन्हें डॉ. संतोष कुमार की पोस्ट पर क्यों बोलना पड़ रहा है? बताया जा सकता है, आजीवक चिंतन के समक्ष जब नवबौद्धों के सारे तर्क खत्म हो गए तब इन जैसों ने अपनी भड़ास निकालने के लिए एक कथन निकाला है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर दुनिया में सबसे ज्यादा अध्ययनशील थे, उन पर कोई कैसे सवाल उठा सकता है? बताइए, यह भी कोई तर्क हुआ! यूं तो मान्यवर कांशीराम तो डॉ. अंबेडकर के मुकाबले कम पढ़े-लिखे लिखे थे, तब ये नवबौद्ध तो मान्यवर कांशीराम को भी कुछ नहीं समझेंगे! पूछा यह भी जा सकता है, डॉ. अंबेडकर जिन जोतिबा फुले को अपना गुरु मानते थे; क्या वे डॉ. अंबेडकर से ज्यादा पढ़े लिखे थे? बुद्ध कितने पढ़े-लिखे थे, यह भी इन को बताना चाहिए।
असल में, यह कोई तर्क नहीं बल्कि कु-तर्क है। बताया जा सकता है कि डॉ. अंबेडकर बहुत पढ़े-लिखे थे। बावजूद गहन अध्ययनशीलता के उन के सामने सारे रास्ते बंद हो गए थे। तब उन्होंने बुद्ध के पास जाने का निर्णय लिया। जिसका दलितों को कोई सरोकार नहीं बल्कि वे अंधे कुएं में गिर गए। एक तरह से यह उनका व्यक्तिगत निर्णय था जो वे दलितों पर थोप रहे थे। डॉ. अंबेडकर द्वारा लिए गए व्यक्तिगत निर्णय दलित कौम के किसी भी काम के सिद्ध नहीं हुए। चाहे वह उनका प्रेम या अंतरजातीय विवाह हो, चाहे बौद्ध धर्म में धर्मांतरण का निर्णय हो और चाहे पूना पैक्ट का मामला हो।
क्या इन्हें नहीं पता कि डॉ. अंबेडकर का बौद्ध धर्मांतरण का निर्णय मात्र एक प्रयोग था। उन्होंने 1956 में धर्मांतरण का प्रयोग किया था जो 1980 तक आते-आते असफल हो गया। महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर 1980 में दलितों के स्वतंत्र धर्म चिंतन पर आ चुके थे। एक तरह से डॉ. अंबेडकर का प्रयोग 24 सालों में ही असफल हो गया था। साल 1980 में दलितों के स्वतंत्र धर्म चिंतन की खोज करते-करते डॉ. साहब जनवरी 2017 में आजीवक चिंतन को कंप्लीट कर देते हैं। इस के बीच में कबीर को लेकर जो महासंग्राम चला है वह किसी से छुपा हुआ नहीं है। जनवरी 2017 में आजीवक चिंतन की स्वतंत्र किताब दे कर डॉ. साहब 09मार्च, 2017 को हमारे बीच से चले गए। तो, बताना यही है कि डॉ. धर्मवीर का चिंतन डॉ. अंबेडकर के चिंतन का विकास है। अब कोई इसे डॉ. अंबेडकर के विरोध में लेता है तो उसकी सोच का कुछ नहीं किया जा सकता।
इन्हें यह तो पता ही होगा कि आज इस देश में बहुत से लोग कई-कई पी-एचडी किए बैठे हैं। क्या वे कई पी-एचडी करने से डॉ. अंबेडकर से ज्यादा विद्वान और बड़े हो जाते हैं? असल में यह डॉ. अंबेडकर को बचाने के लिए कु-तर्क के सिवाय कुछ नहीं है। क्या आज तक ऐसे कोई बच पाया है? वैसे, बताया जा सकता है, डॉ. अंबेडकर की लेखनी में जैन धर्म के संदर्भ नहीं मिलते। जबकि जैन धर्म पूरी तरह से आजीवक धर्म के विरोध में आया है और आजीवक धर्म दलितों का अपना धर्म है। तब पूछा जा सकता है कि डॉ. अंबेडकर ने क्या पढ़ा और क्या लिखा? यहां स्वामी अछूतानंद और बाबू मंगूराम के आदिहिंदू और आदिधर्म आंदोलन की बात नहीं की जा रही। जो डॉ. अंबेडकर के सामने दलितों को मथ रहे थे। इन के संदर्भ भी डॉ. अंबेडकर की लेखनी से गायब मिलते हैं। इससे डॉ. अंबेडकर के पढ़ने-लिखने पर सवाल ही नहीं खड़े होते बल्कि वे संदेह के घेरे में आ जाते हैं।
शीलबोधि का यह कहना बेहद आपत्तिजनक है' 'इनके गुरु की करनी और कथनी में भयंकर अंतर था।' अब इन्हें डॉ. धर्मवीर के लेखन में विरोधाभास बताना होगा अन्यथा इन्हें विक्षिप्त की श्रेणी में रखे जाने से कोई कैसे इंकार कर सकता है। डॉ. धर्मवीर वह हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य में प्रक्षिप्त लेखन को कटघरे में खड़ा कर दिया। ये उनके लेखन में विरोधाभास ढूंढ रहे हैं! असल में ऐसे लोग धूर्त की श्रेणी में आते हैं। और कौन कितना प्रासंगिक है कितना अप्रासंगिक, इसे खुद इन की टिप्पणी से ही समझा जा सकता है। वैसे, वर्णवादियों द्वारा डॉ. अंबेडकर का राजनीति में प्रयोग से उन की प्रासंगिकता समझी जा सकती है।
ऐसे ही लोकनाथ महोदय हैं जिन्हें अच्छे से पता है कि डॉ. धर्मवीर क्या कह रहे हैं। बावजूद इसके, ये आजीवकों को अंबेडकरवादियों और नवबौद्धों को जवाब देने के कह रहे हैं, ये लिख रहे हैं, 'अंबेडकरवादी डॉ. धर्मवीर का विरोध कर रहे हैं।' पूछा जा सकता है, ये जवाब देने से क्यों बच रहे हैं? कहीं इन के मन में कुछ और तो नहीं पक रहा?
असल में, शीलबोधि जैसे लोग अंबेडकरवाद के नाम पर दलितों के लिए नासूर बन चुके बुद्धवाद को ढोने के लिए अभिशप्त हैं। ये जान चुके हैं कि इन की पीढ़ी के बाद दलितों में बुद्ध का कोई नाम लेने वाला नहीं। क्योंकि भिक्षुक, संन्यासी और मुनि को कबीर अपनी लाठी से दौड़ा देते हैं। इसीलिए ये बड़बड़ा रहे हैं। बड़बड़ाने वाले को लोग क्या कहते हैं यह बताने की जरूरत नहीं है।

