पत्रकार जज नहीं
प्रेमेन्द्र / एक अति सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार मित्र कानूनी पचड़े में फंसे हैं। कल उनका फोन आया और इस पर चर्चा हुई। अक्सर पत्रकार कानूनी पेंच में फंसे नजर आते हैं। आए थे पत्रकारिता करने और अब कोर्ट कचहरी के चक्कर लग रहे। इससे बचने के लिए जरूरी है कि पत्रकारिता की सीमाओं को समझा जाए।
पत्रकार जज नहीं ... अक्सर पत्रकार जज बन जाते हैं। वे घटनास्थल पर गए, लोगों से मिले, पुलिस वालों से मिले और एकदम से फैसला सुना दिया कि ये सच्चाई है। अरे इस काम के लिए एक कानून पढ़े, प्रशिक्षित जज को महीनों और सालों लगते हैं कि सच्चाई क्या है और आप दो घंटे में अंतिम फैसला सुना देते हैं ? क्या इतनी बुद्धि जज, वकील या आईपीएस में नहीं होती जितनी आप में है? तो कैसे करें मामलों की रिपोर्टिंग ? एकदम आसान। आप अपने विचार भूल जाएं। पीड़ित पक्ष, पुलिस, अभियुक्त की बातें और तथ्य बस जनता के सामने रखिए और जनता को तय करने दीजिए कि सच्चाई क्या है। आप फैसले मत कीजिए। आपकी 99 फीसदी समस्या हल।
खुद मैने अपने 35 वर्षों के पत्रकारीय और अधिवक्ता के रूप में अनुभव से जाना है कि पहली नजर में जो दिख रहा है, जरूरी नहीं कि वो सच हो। सच एकदम अलग भी हो सकता है। ऐसे में तत्काल जजमेंट दे देना गलत है। न जज बनिए न पुलिस। दोनों को अपना काम करने दीजिए। आप अनुसंधानकर्ता नहीं हैं।
(साभार )

