विनीत कुमार/ न्यूज़ पिंच पर मूनिडीह, धनबाद कोलियरी (बीबीसीएल का उपक्रम) को लेकर 48 मिनट 17 सेकेण्ड की अभिनव पाण्डे और इसके डिप्टी मैनेजर सन्नी राव के बीच की बातचीत आयी है. शुरु के एक-दो मिनट तो आप ज़रूर अभिनव पाण्डे की भदेस शैली में की जाती रही रिपोर्टिंग-बातचीत के प्रभाव में इसे देखना जारी रखते हैं लेकिन धीरे-धीरे आप सन्नी राव के प्रभाव में बंधते चले जाते हैं. मेरे जैसा विज्ञानविहीन दिमाग़ का इंसान जब राव साहब की बात को ठीक-ठीक समझ ले रहे हों कि वो कितनी बारीक़ बातें, कितनी सहजता से बताते जा रहे हैं तो बाक़ी आपलोग जिनकी पृष्ठभूमि विज्ञान अध्ययन की रही हो, इनकी बातचीत और अंदाज़ की गिरफ़्त में आने से ख़ुद को रोक नहीं पाएंगे. और तब,
आपको लगेगा कि हमारे मीडियाकर्मियों की पोशाक में तो समय के साथ-साथ चमक और समृद्धि का एहसास समाता चला गया लेकिन पत्रिकारिता की भाषा कैसे उसी अनुपात में झड़ती चली कि देश का एक पढ़ा-लिखा इंजीनियर जब उसके सामने खड़े होकर पूरी गंभीरता से अपने पेशे के बारे में बात करता है तो हमें समझते देर नहीं लगती कि लेनिन के अंदाज़ में हमारे समाज को समझने की कोशिश में मीडियाकर्मी के शरीर पर लीनन तो चढ़ गया लेकिन उसकी भाषा बेहद तंग, शब्द सीमित और हाव-भाव संकुचित होते चले गए. सामनेवाले को सुनते हुए उसके चेहरे के हाव-भाव बदलते बंद हो गए हैं और तब वो या तो अपनी सपाट शैली में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है या फिर चंद शब्दों की मदद से लूपबयानी करने लग जाता है.
पूरी बातचीत में सन्नी राव मूनिडीह कोयाला खदान के खदानकर्मियों के लिए हमारे सहयोगी, साथी शब्द का प्रयोग करते हैं जबकि अभिनव पांडे वर्कर या मजदूर. ज़ाहिर है पाण्डे या फिर किसी भी मीडियाकर्मी के लिए मज़दूर ही है लेकिन राव के लिए मज़दूर नहीं,सहयोगी..और ऐसा इसलिए कि उन्हें माइनिंग इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान यह बात मजबूती से बतायी-समझायी गयी होगी कि तुम चाहे जितनी भी भारी-भरकम डिग्री लेकर कोयला खदान में उतरोगे, तुम्हारी उपलब्धि उस अंतिम व्यक्ति पर निर्भर करेगी जिसका पसीना, समय, अनुभव और सबसे ज़्यादा काम के प्रति भावनात्मक प्रतिबद्धता जुड़ी होगी. ऐसा इसलिए कि वह वन मैन हीरो का नहीं, सामूहिक प्रयासों का नतीजा होगा. ऐसे में अपने बारे में सोचते हुए भी, दिमाग़ में उस पूरे समूह को शामिल करना होगा. यही कारण है कि लगभग 49 मिनट की इस बातचीत में कुछ सेकेण्ड को छोड़ दें तो पूरे समय स्क्रीन पर सिर्फ अभिनव पाण्डे और सन्नी राव नज़र आते हैं लेकिन राव की बातचीत में वो सामूहिक बोध आख़िर-आख़िर तक मौज़ूद रहता है.
पढ़ाने को तो मीडियाकर्मी को पत्रकारिता की पहली कक्षा और न्यूज़ चैनल की इन्टर्नशिप के पहले दिन बताया-समझाया जाता है कि कल को तुम भले ही स्क्रीन पर सिंघम की तरह चमकने लगे और तुम्हारी मौज़ूदगी के आगे बाक़ी सारी चीज़ें फ़ीकी लगने लगे या फिर तुम्हारे भीतर ही इतनी अकड़ घर कर जाय कि किसी की मौज़ूदगी बर्दाश्त न कर सको लेकिन एक बात याद रखना कि यदि तुमने अपनी क्र्यू से लेकर गाड़ी चालक, वीडियो एडिटर और यहां तक कि इन्टर्न को अपनी स्टोरी का हिस्सा नहीं माना तो तुम्हारी चमक कैसी फ़ीकी पड़ती चली जाएगी, हाथ से स्टोरी छूटने लगेगी...तुम्हें पता भी नहीं चलेगा. लेकिन
मीडियाकर्मी को क्लासरूम और न्यूज़रूम के पाठ ठीक इसी तरह याद रहते हैं, स्क्रीन पर यह मजबूती से दिखाई नहीं देती. इस बातचीत को देखकर भी ऐसा ही लगा और इसकी सबसे बड़ी वजह है कि पत्रकारिता के पेशे की पोशाक जहां-तहां से छीज गयी है और छीज इसलिए गयी है कि कूल दिखने की कोशिश में हमने यह मानना लगभग छोड़ दिया है कि पेशे के तौर पर पत्रकारिता की अपनी भी कोई भाषा होती है और उसके होने से हम रिपोर्ट-ख़बर-बातचीत से उसी तरह बंधते चले जाते हैं जैसे सन्नी राव को कोयला खनन पर सुनते हुए बंध गए.
अभिनव पाण्डे एकाध बार अपने कैमरापर्सन ( अब जिन्हें फोटो जर्नलिस्ट कहना पॉलिटिकली करेक्ट माना जाने लगा है. यह अलग बात है कि कहने के अंदाज़ में एंकर-रिपोर्टर से बाद के व्यक्ति का ही भाव पैदा होता है.) हिमांशु का नाम ज़रूर लेते हैं लेकिन सिर्फ अभिनव पाण्डे ही नहीं, कमोबेस इस पेशे से ही सामूहिक बोध ग़ायब होता चला गया है तो नाम लेने के बावज़ूद सिर्फ मैं का असर पैदा होता है. ऐसे दर्जनों शॉट्स हैं जिन्हें देखकर आप विस्मय से भर जाते हैं, एडिटिंग पर मोहित होते हैं लेकिन यह जान नहीं पाते कि ये सबके होने में अभिनव पाण्डे और नाम के स्तर की हिमांशु की मौज़ूदगी के अलावा बाक़ी कौन लोग हैं. पाण्डे के लिए यह लाइवटाइम एचिवमेंट जैसी चीज़ है लेकिन कहीं किसी और को क्रेडिट देने की पेशेवर ईमानदारी नहीं. ज़ाहिर है यदि पाण्डे के लिए ऐसी जगह पर आना एडवेंचर है तो एडिटिंग-ग्राफ़िक्स-कैमरा, साउंड इफेक्ट्स.. का काम देखने के लिए भी पैटर्न से अलग काम तो रहा ही होगा. वो ख़ुद कहते हैं कि हिन्दुस्तान के कितने लोग यहां आ पाते होंगे, एज अ जर्नलिस्ट ये हमारा प्रिविलेज है कि हम यहां आए हैं...तो इसका मतलब तो यही हुआ कि इन सबको भी ये बात महसूस हो और उसके साथ हम दर्शकों भी. ये हमें एक बार भी महसूस नहीं होता.
सन्नी राव ने अंग्रेजी माध्यम से ही माइनिंग इंजीनियरिंग की पढ़ाई की होगी लेकिन स्क्रीन पर वो उस मिथक से बाहर निकलकर बात करते नज़र आते हैं जिसके अनुसार इंजीनियरिंग की बात हिन्दी में नहीं हो सकती. भाषा के नाम पर उस राजनीति से भी अलग जिसके तहत भाषा इतनी हावी हो जाय कि विषय का ज्ञान न केवल पीछे रह जाय बल्कि ठिकाने ही लगा दिया जाय और सारा जोर हिन्दी बचाने के अभियान की तरफ मुड़ जाय.
सन्नी राव जब बोलना शुरु करते हैं तो अगले तीन-चार मिनट में ही अभिवन पाण्डे की स्क्रीन पर उपस्थिति फ़ीकी पड़ने लग जाती है और हम स्पष्ट तौर पर महसूस कर पाते हैं कि इस बातचीत के लिए बीसीसीएल से अनुमति लेने, आने-जाने, रूकने-खाने के स्तर की तैयारी के अलावा बातचीत के स्तर पर अभिवन पाण्डे की कोई ख़ास तैयारी नहीं है. उनके पास राव से बातचीत करने के लिए ठीक-ठीक शब्दावली तक नहीं है और हिन्दी के इतने कम शब्द है कि वो बीच तक आते-आते भाषाई स्तर पर हांफते नज़र आने लग जाते हैं. ऐसे में वो राव से संस्तुति चाहते हैं, भईया हो-भईया हो के अंदाज़ में माहौल को अनौपचारिक बनाने की कोशिश करते हैं जबकि राव पूरी बातचीत में पेशेवर ढंग से बने रहते हैं. उनको सुनते हुए लगेगा कि वो पूरे बीसीसीएल का प्रतिनिधित्व करते हुए बात कर रहे हैं, अपने काम, परियोजना, सहयोगियों और खनन-प्रक्रिया के बीच से न्यूज़ पिंच के दर्शकों के लिए वो सब बता रहे हैं जैसे कोई उनकी वर्कशॉप में बैठा हो. अपने पेशे की बात वो जिस गंभीरता से करते हैं, वो गंभीरता पत्रकारिता के बीच से तेज़ी से ग़ायब हो रही है.
अभिनव पाण्डे और सन्नी राव की यह बातचीत एक लिटमस पेपर सी है जिससे गुज़रते हुए आपको समझने में मुश्किल नहीं होगी कि हिन्दी के जिन शब्दों को न्यूज़रूम से मुश्किल, किताबी, ऊबाऊ कहकर ठिकाने लगा दिया गया, वो कैसे अभी लोगों के बीच धड़क रहे हैं. सन्नी राव जैसे इंजीनियर-मैनेजर की ज़ुबान पर बहुत ही सहजता के साथ आ रहे हैं. आप चाहें तो इन हिन्दी शब्दों की पूरी की पूरी एक सूची तैयार कर सकते हैं और सवाल कर सकत हैं कि न्यूज़रूम में, किसी मीडियाकर्मी के मुँह से हिन्दी के इन शब्दों को आख़िरी बार कब सुना है ?
दरअसल मीडियाकर्मियों की भाषा क्षमता का हमने जब दो ही पैमाना मान लिया है- एक कि वो किसी भी नेता की बोलती बंद करा दे और दूसरा कि स्क्रीन को गली-मोहल्ले के बीच होना महसूस कराए, ऐसे में जब दूसरे पेशे का ऐसा शख़्स जो अपने काम को लेकर तो गंभीर है ही, बताने को लेकर भी उतना ही गंभीर है और इससे वो हिलता नहीं है तो समझते देर नहीं लगती कि तमाम तरह के तामझाम फैला लेने के बावज़ूद मीडियाकर्मी के बीच से, उसके भीतर से अपने पेशे की भाषा चली गयी है. अब वो उसे कूल, ज़मीनी, सहज...चाहे जो लेबल चस्पां करके ब्रांडिंग करे, पेशेवर के आगे उसकी भाषा फ़ीकी और हांफती नज़र आएगी ही. अभिवन पाण्डे ने लगभग 49 मिनट की बातचीत में कितना कुछ बोला, कितने सवाल किए लेकिन अद्भुत, कमाल..ऐसे ही आधे दर्जन शब्द दिमाग़ में गूंजते रह जाते हैं, बाक़ी सब बिला जाते हैं, कोई तासीर पैदा नहीं करते जबकि राव के शब्दों की दिमाग़ में पूरी एक श्रृंखला तैयार होती चली जाती हैं और बातें भी याद रह जाती है. शोर और समझ का यह फर्क़ ऐसी ही बातचीत से गुज़रने के बाद समझ आता है.

