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सन्त आंदोलन की पृष्ठभूमि में मक्खलि गोसाल का दर्शन है : डॉ.भूरे लाल

'समकालीन समय और सन्त रैदास का 'बेगमपुरा' विषय पर समानांतर विचार मंच के तहत विचार गोष्ठी आयोजित 

संतोष कुमार/ समानांतर विचार मंच के तहत सद्गुरु रैदास की जयंती पर आयोजित विचार गोष्ठी 'समकालीन समय और सन्त रैदास का 'बेगमपुरा' पर अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. भूरे लाल जी ने साफ़ कर दिया कि सन्त आंदोलन का स्वतन्त्र व मौलिक अध्ययन कर ने के लिए हमें  'वैष्णव-फोल्डर' या ' बौद्ध फोल्डर' से बाहर निकलना होगा। बौद्ध आंदोलन द्विजों की क्षत्रिय परम्परा का आंदोलन है, तो वैष्णव आंदोलन की परंपरा दक्षिण के अलवार आंदोलन से जुड़ती है।वहीं सन्त आंदोलन की परंपरा की पृष्ठभूमि में  मक्खलि गोसाल का 6 वीं शताब्दी ईसवी का आजीवक धर्म व दर्शन है। संत आंदोलन की झंकृति आगे 19-20 वीं शताब्दी के 'आदिधर्मी आंदोलन' के अंतर्गत सुनाई पड़ती है, जिस के प्रवर्तक स्वामी अछूतानंद थे.

भूरेलाल जी ने कहा, 'सन्त रैदास का 'बेगमपुरा' वैकल्पिक समाज का दर्शन है।ऐसे समाज का सपना जिस में मनुष्य के द्वारा मनुष्य के शोषण व दमन की कोई व्यवस्था न हो। कोई आतंक,भय,असमानता,विषमता,शोषण,दमन,अन्याय,उत्पीड़न की परिस्थिति न हो। यूटोपिया की परिकल्पना ज़रूरी प्रक्रिया है।जो समाज सपना नहीं ले सकता वह समाज मुर्दा समाज होता है।जीने के लिए सपना लेना अनिवार्य है।डॉ आंबेडकर के यहाँ 'लोकतंत्र'एक ऐसा ही सपना या यूटोपिया है। यूटोपिया  मानवीय संकट के गहरे बोध से उपजता है। भारत में एक वैदिक परंपरा है जो मूलतः असमानता की अवधारणा पर अवलम्बित है तो इस के समानांतर चलने वाली परम्परा को आजीवक परम्परा कहते हैं जो समानता की अवधारणा को रोपती है।'

अपने वक्तव्य में उन्होंने आगे कहा, 'आज भारतीय संविधान  द्वारा विहित 'भारतीय राष्ट्रीयता ' को 'हिन्दू राष्ट्रवाद' में 'रिड्यूस' किया जा रहा है।संविधान एक राजनैतिक समझौते की उपज होता है।उदारवादी हिन्दू धारा ने उसे लागू नहीं किया और आज की कट्टर धारा तो उसे किनारे ही लगा दिया है।भारतीय संविधान से भले ही मुक्कमल लोकतंत्र न स्थापित होता हो लेकिन वह कथित ब्राह्मण तन्त्रतात्मक राज्य 'हिन्दू राष्ट्र' के स्थापना के मार्ग में एक अवरोध ज़रूर है।इसलिए कथित हिन्दू राष्ट्र का अभियान संविधान के बजाय ' मनुस्मृति' को महत्व प्रदान कर रहा है।'मनुस्मृति' भारत के मूलनिवासी समुदायों को गुलाम बनाने की संहिता है। संविधान के पहले सद्गुरु रैदास और कबीर के संयुक्त मोर्चे के रूप में प्रकल्पित 'बेगमपुरा' लोकतांत्रिक मूल्यों की एक मुक्कमल योजना है। आज इसकी पहले से भी अधिक प्रासंगिकता बढ़ गयी है क्योंकि आज ब्राह्मण तन्त्र  अपने वर्चस्ववादी मंसूबों को पूरा कर ने के अभियान को बड़े जोर शोर से चला रहा है।

 विचार गोष्ठी के मुख्य अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और कवि, कथाकार,आलोचक व विचारक प्रो. कालीचरण स्नेही थे,जिन्होंने अपने बड़े विस्तृत व्याख्यान से यह स्थापित किया कि दलितों की गुलामी को रचने वाले कोई बाहरी नहीं बल्कि भीतर के ही लोग हैं जो हिंदुत्व के नाम पर आज भी गुलाम बनाने के अभियान को जारी रखे हुए हैं। दलितों को गुलाम  मुसलमान, ईसाई और सिख  ने बनाया बल्कि इस देश के हिन्दू सिस्टम ने बनाया।गोष्ठी का बीज वक्तव्य डॉ. गाजुला राजू ने दिया जिस में उन्होंने सन्त आंदोलन के अखिल भारतीय स्वरूप को उजागर किया।

मुख्य वक्ता के बाद डॉ. जनार्दन,डॉ रंजीत कुमार, शोध छात्र सुभाषचंद्र ने सम्वाद किया। संचालन डॉ अंशुमान कुशवाहा ने किया। उन्होंने अपने शानदार संचालन के बीच यह बात कही की सन्तों के अघ्यात्म में सम्पूर्ण मनुष्य समाज की 'वेदना'निहित है। गोष्ठी के अंतर्गत  विभिन्न वक्तव्यों से सन्त आंदोलन पर नए ढंग से विचार हो सका।मध्यकाल के सत्ता संघर्ष में सन्त कवियों के हस्तक्षेप की एक अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई।

'समानांतर विचार मंच' के अंतर्गत सद्गुरु रैदास की जयंती के अवसर पर कल दिनांक 27 फरवरी, 2021को इस गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया।  कार्यक्रम की परिकल्पना डॉ. जनार्दन और डॉ. गाजुला राजू की है। इस मंच से अब इलाहाबाद में वैचारिक ,सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र के विभिन्न मुद्दों और समस्याओं पर गहन विचार प्रक्रिया संचालित होगी।

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